Hindi Poetry Pradeep Singh

हिंदी कविता प्रदीप सिंह



1. कविता

रोज की बंधी-बंधाई दिनचर्या से निकली ऊब नहीं है कविता दिनचर्या एक बेस्वाद च्यूंइगम है जिसे बेतरह चबाए जा रहे हैं हम कविता- च्यूइंगम को बाहर निकाल फेंकने की कोशिश है बस ...और एक सार्थक प्रयास भी रंगीन स्क्रीनों की चमक से बेरंग हो चली एक पीढ़ी की आँखों में इंद्रधनुषी रंग भरने का मेरे लिए कविता वक़्त बिताने का नहीं वक़्त बदलने का जरिया है।

2. चिट्ठियां

चींटियों ने उठा कर सब सामान बदल लिए हैं घर अपने भीखू ने भी कर लिया है इंतज़ाम अपनी झुग्गी के लिए नये तिरपाल का नन्हा चातक भी प्यास का सताया अपने पिता की बात का रख कर मान उड़ चला है गंगा की ओर खेतों के पपड़ाए होंठ फट गए हैं और पड़ गई हैं लकीरें किसानों के चेहरों पर कितनी चिट्ठियां भेजी तुमको अब तो बरस जाओ मेघा।

3. देर रात का फोन

देर रात बजती फोन की घण्टी डरा देती है हमें बुरी ख़बर वाले टेलीग्राम की माफ़िक और हमें जाने क्यों आ जाते हैं याद कुनबे के सभी उम्रदराज़ लोग जो खड़े हैं उम्र की अंतिम दहलीज़ पर कंपकंपाते हाथों से उठाते हैं फोन और रख देते हैं कहकर 'रॉन्ग नंबर' तार निकलता है ख़ाली भूल जाते हैं फिर ज़िन्दगी के दिन गिनते सभी उम्रदराज़ लोग जो हो आए थे याद देर रात फोन की घण्टी बजने से।

4. सच

मैं पक्ष में भी बोलूँगा विपक्ष में भी बोलूँगा और तुम्हारे समक्ष ही बोलूँगा पर क्या तुम सच सुन सकोगे? जबकि तुम्हें मेरे बोलने-भर से परेशानी है।

5. लोकतंत्र: एक

मेरी ऊंगली पे लगा काली स्याही का निशान प्रमाण है कि मैंने हथियार थमा दिए हैं फिर उसे जो करेगा इस्तमाल मेरे ही खिलाफ।

6. लोकतंत्र: दो

सड़कें टूटने से पहले नहीं करती इंतज़ार बरसात का जगह-जगह ढेर कूड़े के चाँद को मुँह चिढ़ाते हैं असुरक्षा का भाव हर घर में घर कर गया है महंगाई, बेरोजगारी में लगी है होड़ शिखर पर पहुँचने की ऐसे में पाँच साल बाद आप फिर आये हैं मेरे दर झंडा थामे विकास का जो आँधी चलने पर भी लहराता नहीं मैं पहले की भांति हाथ जोड़े खड़ा हूँ आपका काफ़िला गुज़रने के इंतज़ार में।

7. लोकतंत्र: तीन

चूहे पकड़ने का पिंजरा साफ़ करके लगा दिया है उसमें पनीर का ताज़ा टुकड़ा देश में ये आम चुनाव के दिन हैं।

8. ख़ुदा-हाफिज़

इस बार तो तुम बिल्कुल नहीं आओगे किसी भी कीमत पर नहीं क्या पता तुम ज़िंदा भी हो या... खैर... ख़ुदा बख़्शे तुम्हें लम्बी उम्र और तुम आते रहो साल-दर-साल यूँही मेरे शहर शीत-लहर के साथ हर साल तुम्हारे इलाके में घटता है कुछ अप्रिय और मुझे लगने लगता है तुम नहीं आ सकोगे इस बार मगर आ ही जाते हो तुम सर्दियों के प्रवासी पक्षियों जैसे मैं अक्सर सोचता हूँ यूं कंधे पर बोझा उठाए संतुलन के लिए शरीर को एक और झुकाए गलियों में घूमने से क्या मिलता है तुम्हें सिवाय छुट्टियां सेंकते धूप काटते हम जैसों के हमें तो करना होता है टाइम-पास तो पुकार लेते हैं हम तुम जैसे भोले-भालों को और तुम समझते हो इस निहायत परदेस में कोई मिल गया अपना-सा कंधे पर लदे गट्ठर को रख-कर ज़मीन पर खोल देते हो तुम हमारे आगे अपने दिल की पोटली देर तक बतियाते अचानक दिखता है तुन्हें गट्ठर तुम्हारा और तुम फिर अपने कंधे परिवार की मांगें और ज़रूरतें लादे फिर मिलने की करते दुआ चल देते हो आगे कहते हुए "ख़ुदा हाफिज़" हमारा जवाब लिए बिना ग़ुलाम क़ादिर लून! शालों वाले मेरे कश्मीरी दोस्त हमारा भी तुम्हें "ख़ुदा हाफिज़"।

9. नीलकंठ

देवों और दैत्यों के उकसावे में आकर किए सागर-मंथन से निकले कितने ही बहुमूल्य रत्न पर तुम्हें पिलाया गया केवल विष जिसे तुम न निगल पाए न उगल ही सके तो बना दिया तुम्हें 'नीलकंठ' और पूजा भी जा रहा है तुम्हें सदियों से मगर हे शिव! आज तक ये कोई नहीं जानता कि अन्दर से तुम्हारा कंठ कितना ज़ख्मी है।

10. बस!

सपने टूट ही जाते हैं पलकों की महीन परछती पर अपनी जगह नहीं बना पाते असल में कई सपने बहुत बड़े होते हैं वज़नी भी वो गिर जाते हैं और टूट जाते हैं उनके गिरने से जो गड्ढा बनता है वो कभी नहीं भरता।

11. विकल्प

संगीनों को बनाकर माइक - गा लूँगा ख़ंजरों को करूँगा इस्तेमाल पेन की तरह तलवारों से करूँगा वाल पेंटिंग हथगोले पिट्ठूफोड़ खेलने के काम आएँगे टैंक से होली पर भिगोया जा सकेगा पूरा गाँव एक ही साथ निकाल दूंगा बारूद मिसाइलों का खाली खोलों में बनाऊंगा भूलभुलैया बाकी के हथियार सारे गलाकर साइकलें बनाऊंगा और ढेर सारे खिलौने भी तुम आज भी निर्भर हो हथियारों पर जबकि हज़ारों बरस पूर्व हमारे पुरखों के पास तब थे हथियार जब कोई विकल्प नहीं था।

12. पृथ्वी

कत्ल आत्महत्याएँ शोषण बलात्कार लूट अन्याय झगड़े युद्ध ख़ुशी मस्ती सुख प्यार दोस्ती ममता हँसी उल्लास पृथ्वी तुम्हें क्या मतलब इन सबसे तुम्हारा काम घूमना है केवल पृथ्वी! काश मुझे भी दे पाती तुम अपनी धुरी पर घूमने का हुनर।

13. ताकत

पंखे की हवा में पन्ना पलटना भी है दुश्वार ऐसे तो तूफानी हौंसले हैं मेरे लोग जाने कैसे मुझ में अपनी ताकत देखते हैं।

14. अकेलापन

आँख बंद करके जिधर महसूस हुई छुअन मैंने मुस्कुरा कर कहा हवा हवा संग आँख-मिचौली खेलता हूँ अक्सर इस तरह ही काटता हूँ अकेलापन तुम्हें लगता है खूब आराम में हूँ मैं।

15. एलर्जिक रंग

दिवाली का फुस्स पटाखा हूँ होली का - एलर्जिक रंग लोहड़ी की - गीली लकड़ी बैसाख की - बेमौसम बरसात हूँ मैं सिर्फ विकलांग नहीं हूँ।

16. वक़्त

सोचता हूँ अक्सर कि मैं वक़्त काटता हूँ कि वक़्त मुझे... पता नहीं- पर टुकड़े टुकड़े कम होता जा रहा हूँ मैं।

17. आत्मकथ्य

मेरे विकलांग होने से घर और दादी कभी अकेले नहीं होते मां समझ गई है फर्क सपने और हकीकत का मेरे विकलांग होने से पिता के दांये हाथ की जिम्मेदारियां और बढ़ गई हैं मेरे विकलांग होने से भाई ने पाया है एक अनोखा आत्मविश्वास अकेले ही जूझकर ज़िंदगी की तमाम मुश्किलों से मेरे विकलांग होने से कुछ लोग वक़्त की तेज़ रफ़्तार से थक-कर मेरे पास सुस्ताने आ बैठते हैं जिन्हें जमाने ने मेरी मित्रता का तमगा पहना दिया है जबकि मेरे विकलांग होने पर भी नहीं हो पाता हूँ मैं विकलांग मैं उड़ता हूँ पंछियों के साथ बहता हूँ नदी और हवा में भटकता हूँ अपने आकाश में बादल बनकर मैं अंधेरे का दीपक हूँ और दीपक के तले का अंधेरा भी अगर तुम सोचते हो कि फिर भी विकलांग हूँ मैं तो तुम्हारी सोच को ज़रूरत है मेरी व्हील-चेयर की।

18. आसमान

बहुत पहले तुम अनंत थे फिर हुए कुछ छोटे लगभग मेरे शहर जितने फिर कुछ और छोटे हुए मेरे मोहल्ले जितने फिर सिमटे और रह गए मेरे आँगन जितने और अब रह गए हो उतने ही जितना दिखता है टुकड़ा रौशनदान से पर तुम तो अनंत हो न आसमान।


 
 
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