हिन्दी कविता आचार्य संजीव सलिल
Hindi Poetry Acharya Sanjeev Salil

1. माँ के प्रति

अक्षरों ने तुम्हें ही किया है नमन
शब्द ममता का करते रहे आचमन
वाक्य वात्सल्य पाकर मुखर हो उठे-
हर अनुच्छेद स्नेहिल हुआ अंजुमन

गीत के बंद में छंद लोरी मृदुल
और मुखड़ा तुम्हारा ही आँचल धवल
हर अलंकार माथे की बिंदी हुआ-
रस भजन-भाव जैसे लिये चिर नवल

ले अधर से हँसी मुक्त मुक्तक हँसा
मौन दोहा हृदय-स्मृति ले बसा
गीत की प्रीत पावन धरोहर हुई-
मुक्तिका ने विमोहा भुजा में गसा

लय विलय हो तुम्हीं सी सभी में दिखी
भोर से रात तक गति रही अनदिखी
यति कहाँ कब रही कौन कैसे कहे-
पीर ने धीर धर लघुकथा नित लिखी

लिपि पिता, पृष्ठ तुम, है समीक्षा बहन
थिर कथानक अनुज, कथ्य तुमको नमन
रुक! सखा चिन्ह कहते- 'न संजीव थक'
स्नेह माँ की विरासत हुलस कर ग्रहण

साधना माँ की पूनम बने रात हर
वन्दना ओम नादित रहे हर प्रहर
प्रार्थना हो कृपा नित्य हनुमान की
अर्चना कृष्ण गुंजित करें वेणु-स्वर

माँ थी पुष्पा चमन, माँ थी आशा-किरण
माँ की सुषमा थी राजीव सी आमरण
माँ के माथे पे बिंदी रही सूर्य सी-
माँ ही जीवन में जीवन का है अवतरण

2. माँ को अर्पित चौपदे

बारिश में आँचल को छतरी, बना बचाती थी मुझको माँ
जाड़े में दुबका गोदी में, मुझे सुलाती थी गाकर माँ
गर्मी में आँचल का पंखा, झलती कहती नयी कहानी-
मेरी गलती छिपा पिता से, बिसराती थी मुस्काकर माँ

मंजन स्नान आरती थी माँ, ब्यारी दूध कलेवा थी माँ
खेल-कूद शाला नटखटपन, पर्व मिठाई मेवा थी माँ
व्रत-उपवास दिवाली-होली, चौक अल्पना राँगोली भी-
संकट में घर भर की हिम्मत, दीन-दुखी की सेवा थी माँ

खाने की थाली में पानी, जैसे सबमें रहती थी माँ
कभी न बारिश की नदिया सी कूल तोड़कर बहती थी माँ
आने-जाने को हरि इच्छा मान, सहज अपना लेती थी-
सुख-दुःख धूप-छाँव दे-लेकर, हर दिन हँसती रहती थी माँ

गृह मंदिर की अगरु-धूप थी, भजन प्रार्थना कीर्तन थी माँ
वही द्वार थी, वातायन थी, कमरा परछी आँगन थी माँ
चौका बासन झाड़ू पोंछा, कैसे बतलाऊँ क्या-क्या थी?-
शारद-रमा-शक्ति थी भू पर, हम सबका जीवन धन थी माँ

कविता दोहा गीत गजल थी, रात्रि-जागरण चैया थी माँ
हाथों की राखी बहिना थी, सुलह-लड़ाई भैया थी माँ
रूठे मन की मान-मनौअल, कभी पिता का अनुशासन थी-
'सलिल'-लहर थी, कमल-भँवर थी, चप्पू छैंया नैया थी माँ

3. प्रकृति के दोहे

ले वानस्पतिक औषधि, रहिये सदा प्रसन्न।
जड़ी-बूटियों की फसल, करती धन-संपन्न।।

पादप-औषध के बिना, जीवन रुग्ण-विपन्न।
दूर प्रकृति से यदि 'सलिल', लगे मौत आसन्न।।

पाल केंचुआ बना ले, उत्तम जैविक खाद।
हरी-भरी वसुधा रहे, भूले मनुज विषाद।।

सेवन ईसबगोल का, करे कब्ज़ को दूर।
नित्य परत जल पीजिये, चेहरे पर हो नूर।।

अजवाइन से दूर हो, उदर शूल, कृमि-पित्त।
मिटता वायु-विकार भी, खुश रहता है चित्त।।

ब्राम्ही तुलसी पिचौली, लौंग नीम जासौन।
जहाँ रहें आरोग्य दें, मिटता रोग न कौन?

मधुमक्खी पालें 'सलिल', है उत्तम उद्योग।
शहद मिटाता व्याधियाँ, करता बदन निरोग।।

सदा सुहागन मोहती, मन फूलों से मीत।
हर कैंसर मधुमेह को, कहे गाइए गीत।।

कस्तूरी भिन्डी फले, चहके लैमनग्रास।
अदरक हल्दी धतूरा, लाये समृद्धि पास।।

बंजर भी फूले-फले, दें यदि बर्मी खाद।
पाल केंचुए, धन कमा, हों किसान आबाद।।

भवन कहता घर 'सलिल', पौधें हों दो-चार।
नीम आँवला बेल संग, अमलतास कचनार।।

मधुमक्खी काटे अगर, चुभे डंक दे पीर।
गेंदा की पाती मलें, धरकर मन में धीर।।

पथरचटा का रस पियें, पथरी से हो मुक्ति।
'सलिल' आजमा देखिये, अद्भुत है यह युक्ति।।

घमरा-रस सिर पर मलें, उगें-घनें हों केश।
गंजापन भी दूर हो, मन में रहे न क्लेश।।

प्रकृति-पुत्र बनकर 'सलिल', पायें-दें आनंद।
श्वास-श्वास मधुमास हो, पल-पल गायें छंद।।

4. दशहरे के दोहे

भक्ति शक्ति की कीजिये, मिले सफलता नित्य।
स्नेह-साधना ही 'सलिल', है जीवन का सत्य।।

आना-जाना नियति है, धर्म-कर्म पुरुषार्थ।
फल की चिंता छोड़कर, करता चल परमार्थ।।

मन का संशय दनुज है, कर दे इसका अंत।
हरकर जन के कष्ट सब, हो जा नर तू संत।।

शर निष्ठां का लीजिये, कोशिश बने कमान।
जन-हित का ले लक्ष्य तू, फिर कर शर-संधान।।

राम वही आराम हो, जिसको सदा हराम।
जो निज-चिंता भूलकर सबके सधे काम।।

दशकन्धर दस वृत्तियाँ, दशरथ इन्द्रिय जान।
दो कर तन-मन साधते, मौन लक्ष्य अनुमान।।

सीता है आस्था 'सलिल', अडिग-अटल संकल्प।
पल भर भी मन में नहीं, जिसके कोई विकल्प।।

हर अभाव भरता भरत, रहकर रीते हाथ।
विधि-हरि-हर तब राम बन, रखते सर पर हाथ।।

कैकेयी के त्याग को, जो लेता है जान।
परम सत्य उससे नहीं, रह पता अनजान।।

हनुमत निज मत भूलकर, करते दृढ विश्वास।
इसीलिये संशय नहीं, आता उनके पास।।

रावण बाहर है नहीं, मन में रावण मार।
स्वार्थ- बैर, मद-क्रोध को, बन लछमन संहार।।

अनिल अनल भू नभ सलिल, देव तत्व है पाँच।
धुँआ धूल ध्वनि अशिक्षा, आलस दानव- साँच।।

राज बहादुर जब करे, तब हो शांति अनंत।
सत्य सहाय सदा रहे, आशा हो संत-दिगंत।।

दश इन्द्रिय पर विजय ही, विजयादशमी पर्व।
राम नम्रता से मरे, रावण रुपी गर्व।।

आस सिया की ले रही, अग्नि परीक्षा श्वास।
द्वेष रजक संत्रास है, रक्षक लखन प्रयास।।

रावण मोहासक्ति है, सीता सद्-अनुरक्ति।
राम सत्य जानो 'सलिल', हनुमत निर्मल भक्ति।।

मात-पिता दोनों गए, भू तजकर सुरधाम।
शोक न, अक्षर-साधना, 'सलिल' तुम्हारा काम।।

शब्द-ब्रम्ह से नित करो, चुप रहकर साक्षात्।
शारद-पूजन में 'सलिल' हो न तनिक व्याघात।।

माँ की लोरी काव्य है, पितृ-वचन हैं लेख।
लय में दोनों ही बसे, देख सके तो देख।।

सागर तट पर बीनता, सीपी करता गर्व।
'सलिल' मूर्ख अब भी सुधर, मिट जायेगा सर्व।।

कितना पाया?, क्या दिया?, जब भी किया हिसाब।
उऋण न ऋण से मैं हुआ, लिया शर्म ने दाब।।

सबके हित साहित्य सृज, सतत सृजन की बीन।
बजा रहे जो 'सलिल' रह, उनमें ही तू लीन।।

शब्दाराधक इष्ट हैं, करें साधना नित्य।
सेवा कर सबकी 'सलिल', इनमें बसे अनित्य।।

सोच समझ रच भेजकर, चरण चला तू चार।
अगणित जन तुझ पर लुटा, नित्य रहे निज प्यार।।

जो पाया वह बाँट दे, हो जा खाली हाथ।
कभी उठा मत गर्व से, नीचा रख निज माथ।।

जिस पर जितने फल लगे, उतनी नीची डाल।
छाया-फल बिन वृक्ष का, उन्नत रहता भाल।।

रावण के सर हैं ताने, राघव का नत माथ।
रिक्त बीस कर त्याग, वर तू दो पंकज-हाथ।।

देव-दनुज दोनों रहे, मन-मंदिर में बैठ।
बता रहा तव आचरण, किस तक तेरी पैठ।।

निर्बल के बल राम हैं, निर्धन के धन राम।
रावण वह जो किसी के, आया कभी न काम।।

राम-नाम जो जप रहे, कर रावण सा काम।
'सलिल' राम ही करेंगे, उनका काम तमाम।।

5. फागुनी दोहे

महुआ महका, मस्त हैं पनघट औ' चौपाल
बरगद बब्बा झूमते, पत्ते देते ताल

सिंदूरी जंगल हँसे, बौराया है आम
बौरा-गौरा साथ लख, काम हुआ बेकाम

पर्वत का मन झुलसता, तन तपकर अंगार
वसनहीन किंशुक सहे, पंच शरों की मार

गेहूँ स्वर्णाभित हुआ, कनक-कुंज खलिहान
पुष्पित-मुदित पलाश लख, लज्जित उषा-विहान

बाँसों पर हल्दी चढी, बँधा आम-सिर मौर
पंडित पीपल बाँचते, लगन पूछ लो और

तरुवर शाखा पात पर, नूतन नवल निखार
लाल गाल संध्या किए, दस दिश दिव्य बहार

प्रणय-पंथ का मान कर, आनंदित परमात्म
कंकर में शंकर हुए, प्रगट मुदित मन-आत्म

6. कब होंगे आज़ाद हम

कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?

गए विदेशी पर देशी
अंग्रेज कर रहे शासन
भाषण देतीं सरकारें पर दे
न सकीं हैं राशन
मंत्री से संतरी तक कुटिल
कुतंत्री बनकर गिद्ध-
नोच-खा रहे
भारत माँ को
ले चटखारे स्वाद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?

नेता-अफसर दुर्योधन हैं,
जज-वकील धृतराष्ट्र
धमकी देता सकल राष्ट्र
को खुले आम महाराष्ट्र
आँख दिखाते सभी
पड़ोसी, देख हमारी फूट-
अपने ही हाथों
अपना घर
करते हम बर्बाद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होगे आजाद?

खाप और फतवे हैं अपने
मेल-जोल में रोड़ा
भष्टाचारी चौराहे पर खाए
न जब तक कोड़ा
तब तक वीर शहीदों के
हम बन न सकेंगे वारिस-
श्रम की पूजा हो
समाज में
ध्वस्त न हो मर्याद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?

पनघट फिर आबाद हो
सकें, चौपालें जीवंत
अमराई में कोयल कूके,
काग न हो श्रीमंत
बौरा-गौरा साथ कर सकें
नवभारत निर्माण-
जन न्यायालय पहुँच
गाँव में
विनत सुनें फ़रियाद-
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?

रीति-नीति, आचार-विचारों
भाषा का हो ज्ञान
समझ बढ़े तो सीखें
रुचिकर धर्म प्रीति
विज्ञान
सुर न असुर, हम आदम
यदि बन पायेंगे इंसान-
स्वर्ग तभी तो
हो पायेगा
धरती पर आबाद
कब होंगे आजाद?
कहो हम
कब होंगे आजाद?

7. झुलस रहा है गाँव

झुलस रहा गाँव
घाम में झुलस रहा

राजनीति बैर की उगा रही फसल
मेहनती युवाओं की खो गयी नसल
माटी मोल बिक रहा बजार में असल
शान से सजा माल में नक़ल

गाँव शहर से कहो
कहाँ अलग रहा?
झुलस रहा गाँव
घाम में झुलस रहा

एक दूसरे की लगे जेब काटने
रेवड़ियाँ चीन्ह-चीन्ह लगे बाँटने
चोर-चोर के लगा है ऐब ढाँकने
हाथ नाग से मिला लिया है साँप ने

'सलिल' भले से भला ही
क्यों विलग रहा?
झुलस रहा गाँव
घाम में झुलस रहा

8. बरसो राम धड़ाके से

बरसो राम धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !
लोकतंत्र की
जमीं पर, लोभतंत्र के पैर
अंगद जैसे जम गए अब कैसे हो खैर?
अपनेपन की आड़ ले, भुना
रहे हैं बैर
देश पड़ोसी मगर बन- कहें मछरिया तैर
मारो इन्हें कड़ाके से, बरसो राम
धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !

कर विनाश
मिल, कह रहे, बेहद हुआ विकास
तम की कर आराधना- उल्लू कहें उजास
भाँग कुएँ में घोलकर, बुझा
रहे हैं प्यास
दाल दल रहे आम की- छाती पर कुछ खास
पिंड छुड़ाओ डाके से, बरसो राम
धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !

मगरमच्छ
अफसर मुए, व्यापारी घड़ियाल
नेता गर्दभ रेंकते- ओढ़ शेर की खाल
देखो लंगड़े नाचते, लूले
देते ताल
बहरे शीश हिला रहे- गूँगे करें सवाल
चोरी होती नाके से, बरसो राम
धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !

9. भाषा तो प्रवहित सलिला है

भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर, अवगाहो या करो आचमन

जीव सभ्यता ने ध्वनियों को
जब पहचाना
चेतनता ने भाव प्रगट कर
जुड़ना जाना

भावों ने हरकर अभाव हर
सचमुच माना-
मिलने-जुलने से नव
रचना करना ठाना

ध्वनि-अंकन हित अक्षर आये
शब्द बनाये, मानव ने नित कर नव चिंतन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन

सलिला की कल कल कल
सुनकर मन हर्षाया
साँय-साँय सुन पवन
झकोरों की उठ धाया

चमक दामिनी की जब देखी,
तब भय खाया,
संगी पा, अपनी-उसकी
कह-सुन हर्षाया

हुआ अचंभित, विस्मित, चिंतित,
कभी प्रफुल्लित और कभी उन्मन अभिव्यंजन
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन

कितने पकडे, कितने छूटे
शब्द कहाँ-कब?
कितने सिरजे, कितने लूटे
भाव बता रब

अपना कौन?, पराया
किसको कहो कहें अब?
आये-गए कहाँ से कितने
जो बोलें लब

थाती, परिपाटी, परंपरा
कुछ भी बोलो पर पालो सबसे अपनापन.
भाषा तो प्रवहित सलिला है
आओ! तट पर,
अवगाहो या करो आचमन

10. मत हो राम अधीर

जीवन के
सुख-दुःख हँस झेलो,
मत हो राम अधीर

भाव, आभाव, प्रभाव ज़िन्दगी
मिलन, विरह, अलगाव जिंदगी
अनिल अनल परस नभ पानी-
पा, खो, बिसर स्वभाव
ज़िन्दगी
अवध रहो या तजो, तुम्हें तो
सहनी होगी पीर

मत वामन हो, तुम विराट हो
ढाबे सम्मुख बिछी खाट हो
संग कबीरा का चाहो तो-
चरखा हो या फटा
टाट हो
सीता हो या द्रुपद सुता हो
मैला होता चीर

विधि कुछ भी हो कुछ रच जाओ
हरि मोहन हो नाच नचाओ
हर हो तो विष पी मुस्काओ-
नेह नर्मदा नाद
गुँजाओ
जितना बहता 'सलिल' सदा हो
उतना निरमा नीर

11. अपना हर पल है हिंदीमय

अपना हर पल है
हिन्दीमय, एक दिवस क्या खाक मनाएँ?
बोलें-लिखें नित्य अंग्रेजी जो वे एक दिवस जय गाएँ

निज भाषा को
कहते पिछडी, पर भाषा उन्नत बतलाते
घरवाली से आँख फेरकर देख पडोसन को ललचाते
ऐसों की जमात में बोलो,
हम कैसे शामिल हो जाएँ?

हिंदी है दासों
की बोली, अंग्रेजी शासक की भाषा.
जिसकी ऐसी गलत सोच है, उससे क्या पालें हम आशा?
इन जयचंदों की खातिर
हिंदीसुत पृथ्वीराज बन जाएँ

ध्वनिविज्ञान-
नियम हिंदी के शब्द-शब्द में माने जाते
कुछ लिख, कुछ का कुछ पढने की रीत न हम हिंदी में पाते
वैज्ञानिक लिपि, उच्चारण भी
शब्द-अर्थ में साम्य बताएँ

अलंकार, रस, छंद
बिम्ब, शक्तियाँ शब्द की बिम्ब अनूठे
नहीं किसी भाषा में मिलते, दावे करलें चाहे झूठे
देश-विदेशों में हिन्दीभाषी
दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाएँ

अन्तरिक्ष में
संप्रेषण की भाषा हिंदी सबसे उत्तम
सूक्ष्म और विस्तृत वर्णन में हिंदी है सर्वाधिक सक्षम
हिंदी भावी जग-वाणी है
निज आत्मा में 'सलिल' बसाएँ

12. इसरो को शाबाशी

इसरो को शाबाशी
किया अनूठा काम

'पैर जमाकर
भू पर नभ ले लूँ हाथों में'
कहा कभी न्यूटन ने सत्य किया इसरो ने
पैर रखे धरती पर नभ छूते अरमान
एक छलाँग लगाई
मंगल पर
है यान

पवनपुत्र के वारिस
काम करें निष्काम

अभियंता-
वैज्ञानिक जाति-पंथ हैं भिन्न
लेकिन कोई किसी से कभी न होता खिन्न
कर्म-पुजारी सच्चे नर हों या हों नारी
समिधा लगन-समर्पण
देश हुआ
आभारी

गहें प्रेरणा हम सब
करें विश्व में नाम

13. कोशिश करते रहिए

कोशिश करते रहिए,
निश्चय मंज़िल मिल जाएगी

जिन्हें भरोसा है अतीत पर
नहीं आज से नाता
ऐसों के पग नीचे से
आधार सरक ही जाता
कुंवर, जमाई या माता से
सदा राज कब चलता?
कोष विदेशी बैंकों का
कब काम कष्ट में आता

हवस आसुरी
वृत्ति तजें
तब आशा फल पायेगी

जिसने बाजी जीती उसको
मिली चुनौती भारी
जनसेवा का समर जीतने की
अब हो तैयारी
सत्ता करती भ्रष्ट, सदा ही
पथ से भटकाती है
अपने हों अपनों के दुश्मन
चला शीश पर आरी

सम्हलो
करो सुनिश्चित
फूट न आपस में आएगी

जीत रहे अंतर्विरोध पर
बाहर शत्रु खड़े हैं
खुद अंधे हों काना करने
हमें ससैन्य अड़े हैं
हैं हिस्सा इस महादेश का
फिर से उन्हें मिलाना
महासमर ही चाहे हमको
बरबस पड़े रचाना

वेणु कृष्ण की
तब गूँजेगी
शांति तभी आएगी

14. चूहा झाँक रहा हाँडी में

चूहा झाँक रहा
हाँडी में, लेकिन पाई सिर्फ हताशा

मेहनतकश के हाथ हमेशा
रहते हैं क्यों खाली-खाली
मोटी तोंदों के महलों में
क्यों बसंत लाता खुशहाली

ऊँची कुर्सीवाले
पाते अपने मुँह में सदा बताशा

भरी तिजोरी फिर भी भूखे
वैभवशाली आश्रमवाले
मुँह में राम बगल में छूरी
धवल वसन अंतर्मन काले

करा रहा या
'सलिल' कर रहा ऊपरवाला मुफ्त तमाशा

अँधियारे से सूरज उगता
सूरज दे जाता अँधियारा
गीत बुन रहे हैं सन्नाटा,
सन्नाटा हँस गीत गुँजाता

ऊँच-नीच में
पलता नाता तोल तराजू तोला-माशा

15. जो नहीं हासिल

जो नहीं हासिल वही सब
चाहिए

जब किया कम काम ज्यादा दाम पाया
या हुए बदनाम या यश नाम पाया
भाग्य कुछ अनुकूल थोड़ा वाम पाया
जो नहीं भाया वही अब
चाहिए

चैन पाकर मन हुआ बेचैन ज्यादा
वजीरों पर हुआ हावी चतुर प्यादा
किया लेकिन निभाया ही नहीं वादा
पात्र जो जिसका वही कब
चाहिए

सगे सत्ता के रहे हैं भाट-चारण
संकटों का कंटकों का कर निवारण
दूर कर दे विफलता के सफल कारण
बंद मुट्ठी में वही रब
चाहिए

कहीं पंडा कहीं झंडा कहीं डंडा
जोश तो है गरम लेकिन होश ठंडा
गैस मँहगी हो गयी तो जला कंडा
पाठ-पूजा तज वही पब
चाहिए

बिम्ब ने प्रतिबिम्ब से कर लिया झगड़ा
मलिनता ने धवलता को 'सलिल' रगडा
शनिश्चर कमजोर मंगल पड़ा तगड़ा
दस्यु के मन में छिपा नब
चाहिए

16. पीढ़ियाँ अक्षम हुई हैं

पीढ़ियाँ अक्षम हुई हैं,
निधि नहीं जाती सँभाली

छोड़ निज जड़ बढ़ रही हैं
नए मानक गढ़ रही हैं
नहीं बरगद बन रही ये-
पतंगों सी चढ़ रही हैं

चाह लेने की असीमित-
किन्तु देने की कंगाली

नेह-नाते हैं पराये
स्वार्थ-सौदे नगद भाये
फेंककर तुलसी घरों में-
कैक्टस शत-शत उगाये

तानती हैं हर प्रथा पर
अरुचि की झट से दुनाली

भूल देना-पावना क्या?
याद केवल चाहना क्या?
बहुत जल्दी 'सलिल' इनको-
नहीं मतलब भावना क्या?

जिस्म की कीमत बहुत है
रूह की है फटेहाली

17. शहर में मुखिया आए

शहनाई बज रही
शहर में मुखिया आए

जन-गण को कर दूर निकट नेता-अधिकारी
इन्हें बनायें सूर छिपाकर कमियाँ सारी
सबकी कोशिश करे मजूरी
भूखी सुखिया
फिर भी गाये

है सच का आभास कर रहे वादे झूठे
करते यही प्रयास वोट जन गण से लूटें
लोकतंत्र की लख मजबूरी,
लोभतंत्र
दुखिया पछताये

आए-गये अखबार रँगे, रेला-रैली में
शामिल थे बटमार कर्म-चादर मैली में
अंधे देखें, बहरे सुन,
गूँगे बोलें
हम चुप रह जाएँ

18. हाइकु गजल-आया वसंत

आया वसंत, / इन्द्रधनुषी हुए / दिशा-दिगंत
शोभा अनंत / हुए मोहित, सुर / मानव संत

प्रीत के गीत / गुनगुनाती धूप / बनालो मीत
जलाते दिए / एक-दूजे के लिए / कामिनी-कंत

पीताभी पर्ण / संभावित जननी / जैसे विवर्ण
हो हरियाली / मिलेगी खुशहाली / होगे श्रीमंत

चूमता कली / मधुकर गुंजार / लजाती लली
सूरज हुआ / उषा पर निसार / लाली अनंत

प्रीत की रीत / जानकार न जाने / नीत-अनीत
क्यों कन्यादान? / 'सलिल' वरदान / दें एकदंत

19. आँखें रहते सूर हो गए

आँखें रहते सूर हो गए
जब हम खुद से दूर हो गए
खुद से खुद की भेंट हुई तो-
जग-जीवन के नूर हो गए

सबलों के आगे झुकते सब
रब के आगे झुकता है नब
वहम अहम् का मिटा सकें तो-
मोह न पाते दुनिया के ढब
जब यह सत्य समझ में आया-
भ्रम-मरीचिका दूर हो गए

सुख में दुनिया लगी सगी है
दुःख में तनिक न प्रेम पगी है
खुली आँख तो रहो सुरक्षित-
बंद आँख तो ठगा-ठगी है
दिल पर लगी चोट तब जाना-
'सलिल' सस्वर सन्तूर हो गए

20. अपने सपने

अपने
सपने कर नीलाम
औरों के कुछ आएँ काम

तजें
अयोध्या अपने हित की
गहें राह चुप सबके हित की
लोक हितों की कैकेयी अनुकूल
न अब हो वाम

लोक-
नीति की रामदुलारी
परित्यक्ता जनमत की मारी
वैश्वीकरण रजक मतिहीन
बने-बिगाड़े काम

जनमत-
बेपेंदी का लोटा
सत्य-समझ का हरदम टोटा
मन न देखता देख रहा है
'सलिल' चमकता चाम...

21. चुप न रहें

चुप न रहें
निज स्वर में गाएँ
निविड़ तिमिर में दीप जलाएँ

फिक्र नहीं
जो जग ने टोका
पीर बढ़ा दी हर पग रोका
झेल प्रबलतूफाँ का झोंका
मुश्किल में मुस्कायें

कौन
किसी का सदा सगा है?
अपनेपन ने छला-ठगा है
झूठा नाता नेह पगा है
सत्य न यह बिसराएँ

कलकल
निर्झेर बन बहना है
सुख-दुःख सम चुप रह सहना है
नहीं किसी से कुछ कहना है
रुकें न, मंजिल पाएँ

22. स्वप्नों को आने दो

स्वप्नों को
आने दो, द्वार खटखटाने दो.
स्वप्नों की दुनिया में ख़ुद को
खो जाने दो

जब हम
थक सोते हैं, हार मान रोते हैं.
सपने आ चुपके से उम्मीदें बोते हैं.
कोशिश का हल-बक्खर नित
यथार्थ धरती पर
आशा की मूठ थाम अनवरत
चलाने दो

मन को
मत भरमाओ, सच से मत शर्माओ.
साज उठा, तार छेड़, राग नया निज गाओ.
ऊषा की लाली ले, नील
गगन प्याली ले.
कर को कर तूलिका मन को
कुछ बनाने दो

नर्मदा सा
बहना है, निर्मलता गहना है.
कालकूट पान कर कंठ-धार गहना है.
उत्तर दो उत्तर को, दक्षिण
से आ अगस्त्य
बहुत झुका विन्ध्य दीन अब तो
सिर उठाने दो

क्यों गुपचुप
बैठे हो? विजन वन में पैठे हो.
धर्म-कर्म मर्म मान, किसी से न हेठे हो.
आँख मूँद चलना मत, ख़ुद को
ख़ुद छलना मत.
ऊसर में आशान्कुर पल्लव
उग आने दो

23. ओढ़ कुहासे की चादर

ओढ़ कुहासे की चादर,
धरती लगाती दादी.
ऊँघ रहा सतपुडा,
लपेटे मटमैली खादी...

सूर्य अंगारों की सिगडी है,
ठण्ड भगा ले भैया.
श्वास-आस संग उछल-कूदकर
नाचो ता-ता थैया।
तुहिन कणों को हरित दूब,
लगती कोमल गादी...

कुहरा छाया संबंधों पर,
रिश्तों की गरमी पर।
हुए कठोर आचरण अपने,
कुहरा है नरमी पर।
बेशरमी नेताओं ने,
पहनी-ओढी-लादी...

नैतिकता की गाय काँपती,
संयम छत टपके.
हार गया श्रम कोशिश कर,
कर बार-बार अबके।
मूल्यों की ठठरी मरघट तक,
ख़ुद ही पहुँचा दी...

भावनाओं को कामनाओं ने,
हरदम ही कुचला.
संयम-पंकज लालसाओं के
पंक-फंसा- फिसला।
अपने घर की अपने हाथों
कर दी बर्बादी...

बसते-बसते उजड़ी बस्ती,
फ़िर-फ़िर बसना है।
बस न रहा ख़ुद पर तो,
परबस 'सलिल' तरसना है.
रसना रस ना ले, लालच ने
लज्जा बिकवा दी...

हर 'मावस पश्चात्
पूर्णिमा लाती उजियारा.
मृतिका दीप काटता तम् की,
युग-युग से कारा.
तिमिर पिया, दीवाली ने
जीवन जय गुंजा दी...

24. कागा आया है

कागा आया है
जयकार करो,
जीवन के हर दिन
सौ बार मरो...

राजहंस को
बगुले सिखा रहे
मानसरोवर तज
पोखर उतरो...

सेवा पर
मेवा को वरीयता
नित उपदेशों
मत आचरण करो...

तुलसी त्यागो
कैक्टस अपनाओ
बोनसाई बन
अपनी जड़ कुतरो...

स्वार्थ पूर्ति हित
कहो गधे को बाप
निज थूका चाटो
नेता चतुरो...

कंकर में शंकर
हमने देखा
शंकर को कंकर
कर दो ससुरो...

मात-पिता माँगे
प्रभु से लड़के
भूल फ़र्ज़, हक
लड़के लो पुत्रो...

25. पूनम से आमंत्रण

पूनम से आमंत्रण पाकर,
ज़रा-ज़र्रा बना सितारा...

पैर थक रहे
तो थकने दो.
कदम रुक रहे
तो रुकने दो.
कभी हौसला
मत चुकने दो.
गिर-उठ-बढ़
ऊपर उठने दो.
एक दिवस देखे प्रयास यह
हर मंजिल ने विहँस दुलारा...

जितनी वक़्त
परीक्षा लेगा।
उतनी हमको
शिक्षा देगा।
नेता आकर
भिक्षा लेगा।
आम नागरिक
दीक्षा देगा.
देखेगा गणतंत्र हमारा।
सकल जगत ने उसे दुलारा...

असुर और सुर
यहीं लड़े थे।
कौरव-पांडव
यहीं अडे थे.
आतंकी मृत
यहीं पड़े थे.
दुश्मन के शव
यहीं गडे थे।
जिसने शिव को अंगीकारा।
उसी शिवा ने रिपुदल मारा...

26. मौन रो रही कोयल

मौन रो रही कोयल
चले श्वास-चौसर पर
आसों का शकुनी नित दाँव
मौन रो रही कोयल,
कागा हँसकर बोले काँव

संबंधों को अनुबंधों ने
बना दिया बाज़ार
प्रतिबंधों के धंधों के
आगे दुनिया लाचार
कामनाओं ने भावनाओं को
करा दिया नीलम
बद को अच्छा माने दुनिया
कहे बुरा बदनाम
ठंडक देती धूप
तप रही बेहद कबसे छाँव

सद्भावों की सती नहीं है,
राजनीति रथ्या.
हरिश्चंद्र ने त्याग सत्य
चुन लिया असत मिथ्या
सत्ता शूर्पनखा हित लड़ते
हाय! लक्ष्मण-राम
खुद अपने दुश्मन बन बैठे
कहें विधाता वाम
भूखे मरने शहर जा रहे
नित ही अपने गाँव

'सलिल' समय पर
न्याय न मिलता,
देर करे अंधेर
मार-मारकर बाज खा रहे
कुर्सी बैठ बटेर
बेच रहे निष्ठाएँ अपनी
पल में लेकर दाम
और कह रहे हैं संसद में
'भला करेंगे राम.'
अपने हाथों तोड़-खोजते
कहाँ खो गया ठाँव?

27. दीपावली मनाएँ

दीप ज्योति बनकर हम
जग में नव प्रकाश फैलाएं.
आत्म और परमात्म मिलाकर
दीप-ज्योति बन जाएँ...

दस दिश प्रसरित हो प्रकाश
तम् तनिक न हो अवरोध.
सबको उन्नति का अवसर हो
स्वाभिमान का बोध.
पढने, बढ़ने, जीवन गढ़ने
का सबको अधिकार.
जितना पायें, शत गुण बाँटें
बढे परस्पर प्यार.
रवि सम तम् पी, बाँट उजाला
जग ज्योतित कर जाएँ.
अंतर्मन का दीप बालकर
दीपावली मनाएँ...

अंधकार की कारा काटें,
उजियारा हो मुक्त.
निज हित गौड़, साध्य सबका हित,
जन-गण हो संयुक्त.
श्रम-सीकर की विमल नर्मदा,
'सलिल' करे अवगाहन.
रचें शून्य से स्रष्टि समूची,
हर नर हो नारायण.
आत्म मिटा विश्वात्म बनें,
परमात्म प्राप्त कर पायें.
'मैं' को 'हम' में कर विलीन,
'सब' दीपावली मनाएँ...

एक दीप गर जले अकेला,
तूफां उसे बुझाता.
शत दीपो से जग रोशन हो,
अंधकार डर जाता.
शक्ति एकता में होती है,
जो चाहे वह कर दे.
माटी के नन्हें दीपक को
तम् हरने का वर दे.
बने अमावस भी पूनम,
यदि दीप साथ जल जाएँ.
स्नेह-साधना करें अनवरत
दीपावली मनाएँ...