Poems on Sparrow (Goraya)
गौरैया पर केंद्रित कविताएं

आज (20 मार्च) विश्व गौरैया दिवस है । दुनियाभर में गौरैया पक्षी की संख्या में बेहद तेजी से कमी आ रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए पूरी दुनिया में 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है। इस दिन को दुनिया भर में इस पक्षी के संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए मनाया जाता है।लेकिन बड़ा सवाल है कि हम इसको लेकर इतने जागरूक हुए हैं। जानकारी के अनुसार दुनिया भर में इस पक्षी की संख्या लगातार घटती जा रही है, जिसको देखते हुए साल 2010 में इस दिन की शुरुआत की गई।एक समय था जब हमारे घरों में इस पक्षी के घोसले नज़र आते थे और इनकी मीठी आवाज से ही हमारी सुबह होती थी।आज विकास की अंधी दौड़ की वजह से इस पक्षी के अस्तित्त्व पर संकट है। अब यदाकदा गाँव में ही इसको हम देखकर अपनी पीठ थपथपा लेते हैं । हिंदी कविता बहुत से कवियों ने इस पक्षी के महत्त्व को पहचान कर उसके अनेक पक्षों को अपनी कविता में जगह दी है । आप भी गौरैया पर केंद्रित कुछ कविताओं को पढ़िए और उसको बचाने के प्रयास कीजिये। -युवा आलोचक नीरज कुमार मिश्र ।

गौरैया पर केंद्रित कविताएं



1. गौरैया गुनगुनाती है गौना - गीत-गोलेन्द्र पटेल

१. गौना के दिन आँगन में गौरैया गुनगुना रही है गीत किस्सागोई की सोनचिरैया कैसे सुनेगी ससुरे में चौखट के बाहर चिड़ियों की चहचहाहट चल सखी चलती हूँ तेरे ससुरे डोली से उतरती पग धरी नयी धरा पर खिल गये सारे फूल चौपाये-चकित-चक्षु ताक रहे हैं उसकी ओर चंचल चिड़िया बोली सखी शीघ्र देखोगी दुख की भोर इस घर का रूल रुला रहा है हमें...! २. मुंडेर पर बैठा कौआ काँव-काँव की भाषा में कोयल की करतूतों का कर्णफूल गढ़ रहा है नया छंद में पढ़ रहा है कोई नयी कविता एक छोटी चिड़िया चीं-चीं करती हुई चुग रही है चेतना की चावल चूल्हे के पास उल्लू पहचान कर कहा : यह तो तेरे नैहर की गौरैया है...! (कविता : "गौरैया गुनगुनाती है गौना-गीत" से, 2018)

2. अरी ओरी, मेरी भोर की चिरैया गौरैया - रवीन्द्रनाथ ठाकुर

अरी ओरी, मेरी भोर की चिरैया गौरैया, कुछ कुछ रहते अँधेरे में फटते ही पौ नींद का नशा जब रहता कुछ बाकी तब खिड़की के काँच पर मारती तुम चोंच आकर, देखना चाहती हो ‘कुछ खबर है क्या’। फिर तो व्यर्थ झूठमूठ को चाहे जैसे नाचकर चाहे जैसे चुहचुहाती हो; निर्भीक तुम्हारी पुच्छ शासन कर सकल विध्न बाधा को करती तुच्छ। तड़के ही दोयलिया देती जब सीटी है कवियों से पाती बख्शीश कुछ मीठी है; लगातार प्रहर प्रहर भर मात्र एक पंचम सुर साधकर छिपे-छिपे कोयलिया करती उस्तादी है- ढकेल सब पक्षियों को किनारे एक कालिदास की पाई वाहवाही उसी ने नेक। परवाह नहीं करती हो उसकी जरा भी तुम, मानती नहीं हो तुम सरगम के उतार और चढ़ाव को। कालिदास के घर में घुस छन्दोभंग चुहचुहाना मचातीं तुम किस कौतुक से ! नवरत्न सभा के कवि गाते जब अपना गान तुम तब सभा स्तम्भों पर करती हो क्या सन्धान? कवि प्रिया की तुम पड़ोसिन हो, मुखरित प्रहर प्रहर तक तुम दोनों का रहता साथ। वसन्त बयाना दिया नहीं वह तुम्हारा नाटय, जैसा जैसा तुम्हारा नाच उसमें नहीं कुछ परिपाटय। अरण्य की गायन सभा में तुम जातीं नहीं सलाम ठोंक, उजाले के साथ ग्राम्य भाषा में समक्ष आलाप होता ; न जाने क्या अर्थ उसका नहीं है अभिधान में शायद कुछ होगा अर्थ तुम्हारे स्पन्दित हृदय ज्ञाने में। दायें बायें मोड़-मोड़ गरदन को करतीं क्या मसखरी हो अकारण ही दिन-दिन भर, ऐसी क्या जल्दी है? मिट्टी तुम्हारा स्नेह धूल ही में करतीं स्नान- ऐसी ही उपेक्षित है तुम्हारी यह देह-सज्जा मलिनता न लगती कहीं, देती न तुम्हें लज्जा। बनाती हो नीड़ तुम राजा के घर छत के किसी कोने में दुबका चोरी है ही नहीं तुम्हारे कहीं मन में। अनिद्रा में मेरी जब कटती है दुख की रात आशा मैं करता हूं, द्वार पर तुम्हारा पड़े चंचुघात। अभीक और सुन्दर-चंचल तुम्हारी सी वाणी सहज प्राण की ला दो मुझे ला दो- सब जीवों का प्रकाश दिन का मुझे बुला लेता है, ओरी मेरी भोर की चिरैया गौरैया।"

3. गौरैय्या और मैं - केदारनाथ अग्रवाल

"मुझसे घबराती है छोटी गौरैय्या क्योंकि मैं उड़ता नहीं घटिया हूँ।"

4. ठंड और गौरैया - केदारनाथ सिंह

"मौसम की पहली सिहरन और देखता हूँ अस्तव्यस्त हो गया सारा शहर और सिर्फ़ वह गौरैया है जो मेरी भाषा की स्मृति में वहाँ ठीक उसी तरह बैठी है और खूब चहचहा रही है वह चहचहा रही है क्योंकि वह ठंड को जानती है जैसे जानती है वह अपनी गर्दन के भूरे भूरे रोओं को वह जानती है कि वह जिस तरफ़ जायेगी उसी तरफ़ उड़कर चली आयेगी ठंड भी क्योंकि ठंड और गौरैया दोनों का बहुत कुछ है बहुत कुछ साझा और बेहद मूल्यवान जो इस समय लगा है दांव पर।"

5. गौरेया - रामदरश मिश्र

"बचपन में देखता था गौरैयों को अपने कच्चे घर के आँगन में, छत्ते पर और आसपास के पेड़ों पर- सुबह-शाम चहकते हुए कुछ गौरैयाँ तो दिन में भी फुदकती रहती थीं आँगन में रात को सोते समय माँ सुनाती थी गौरैयों की कहानियाँ और हम बच्चे सैर करने लगते थे एक मानुषेतर लोक में, उसका होकर घर कितना प्यारा घर लगता था। आज शहर में चारों ओर चर्चा है कि लुप्त हो गई है गौरैयों की प्रजाति हाँ, शहर में कहाँ आयें और चहकें गौरैयाँ न मकानों में आँगन रहे न आसपास पेड़-पौधे कितना सुखद है कि शहर में मेरे मकान में आँगन है और उसमें कुछ पेड़-पौधे भी वहाँ सुबह-शाम झुंड की झुंड गौरैयाँ चहचहाती हैं गृहिणी द्वारा रखे गये दाने चुगती हैं पानी पीती हैं, उसमें अदा से नहाती हैं और अनेक भंगिमाओं के साथ नाचती हैं मैं कितना भाग्यशाली हूँ कि बचपन से लेकर आज तक मेरा घर घरा बना हुआ है।"

6. चटक विलसित - अशोक वाजपेयी

"उस गहरे नीले अंधेरे से आलोक-स्फुरित होकर आने से पहले एक दस्तक सुख के द्वार पर, एक और थपथपाहट आलस्य-भरी तृप्ति के उद‍गम पर-- गौरैया फुदकती है दो-तीन बार अंधेरे पुष्प के उजले प्रस्फुटन के बाद।"

7. गौरेय्या और घर -उपेन्द्र कुमार

"सुबह होते ही फिर आ जाती है गौरेया बज रही है घर की घंटी अब न पूछना बजा सकती है गौरेया घंटी हम तुम बजा सकते हैं जब तब गौरेया भी बजा सकती है, मेरे घर की यानी, कविता के घर की घंटी- बजाती है रह-रह हर मौसम में कविता के घर की घंटी पिछले दिन कविता के घर बैठे-बैठे मैंने ही टाला था- कल आना और सच में ही आ धमकी कल यानी कविता रचने के कल में ओह भगवान क्या करूँ तुम्हारे घरों में जब वह आती है तो क्यों नहीं कहते हो तुम- गौरेया रानी, शुभ है तुम्हारा आना जहाँ मन करे, लगा लो घोंसला इधर के ओसारे में या इधर दालान में पर कविता के घर में गौरेया ने जैसे ही बिखेरे टूटे कटे तिनके नीड़ पूरा हो गया हाँ पूरा निकल कविता से बाहर गौरेया ने फैलाए पंख और एक बयानी-सी स्मृति में छप गई कविता की तरह।"

8. चिड़िया का ब्याह - दिविक रमेश

"चिड़िया की बारात नहीं आती चिड़िया पराई नहीं हो जाती चिड़िया का दहेज नहीं सजता चिड़िया को शर्म नहीं आती तो भी चिड़िया का ब्याह हो जाता है चिड़िया के ब्याह में पानी बरसता है पानी बरसता है पर चिड़िया कपड़े नहीं पहनती चिड़िया नंगी ही उड़ान भरती है नंगी ही भरती है उड़ान चिड़िया चिड़िया आत्महत्या नहीं करती।"

9. उड़ान - सुभाष राय

"जब भी मैं आसमान की ओर देखता हूँ चिड़ियों की उड़ान उदास कर देती है अपने कन्धों पर महसूस करता हूँ झड़ गए पँखों के निशान गहरे घाव की तरह दर्द उभरता है और निगल जाता है मुझे नहीं, अब उड़ नहीं सकता मैं आसमान से धरती को नहीं देख सकता एक साथ, एक नज़र में गोते नहीं लगा सकता सितारों के नीचे, ज़मीन के ऊपर ख़ुद को समेटकर चिड़ियों के पीछे नहीं भाग सकता उनके घोंसलों तक उनके बच्चों को माँ की तरह स्पर्श नहीं कर सकता मुझे याद है धरती पर बिखरे सुख-सौन्दर्य के लालच में मैंने ही अपने पँख कतर डाले बान्ध लिया अपने आप को मुरझा जाने वाले फूलों की पँखड़ियों से समय के साथ ख़त्म हो जाने वाली ख़ुशबू की बेड़ियों से मेरे मन में धरती पर उगने की ऐसी आकाँक्षा जगी कि मैं रोक नहीं सका अपने आप को उगा तो पर अब उड़ान कहाँ पेड़ हो गया जबसे सोचता हूँ उड़ान से लौटकर चिड़ियों का झुण्ड मेरी हज़ार बाँहों पर बैठा करे आपस में बतियाते हुए मेरी पत्तियों की आड़ में घोंसले बनाए सो जाए रोज़ सुबह होने तक ताकि मैं भी थोड़ी देर के लिए ही सही पेड़ से चिड़िया में बदल सकूँ।"

10. गौरैया का एक घोंसला - नरेंद्र पुण्डरीक

"जीवन की शुरुवात हुई थी तो सबसे पहले गौरैया मिली थी चीं-चीं करती हुई हमारी चूं-चूं के साथ गौरैया की चीं-चीं हमारे घरों की आवाज़ थी घर हैं पर उनमें मोती नहीं पैदा हो रहे जिनके घरों में गौरैया का घोंसला होता था जिनमें हमारे बच्चों की तरह उनके बच्चे चूं-चूं करते थे घरों में जब घोंसलों के लिए जगह नहीं बची तो मोती कहाँ से पैदा होते कविता में सही लेकिन इधर महसूस किया जा रहा है कि जीवन को जीवन बनाये रखने के लिए मोती जरूरी हैं और मोती के लिए उतना ही जरूरी है गौरैया का एक घोंसला और उसके बच्चों की चीं-चीं।"

11. गौरैया - मणि मोहन

"स्कूल गई है गौरैया अभी घर में पसरा है सन्नाटा पौने तीन बजे होगी छुट्टी तीन बजे तक लौटेगी गौरैया आते ही फेंकेगी अपने जूते बरामदे में और बस्ता ड्राइंगरूम में (कभी-कभार इसके ठीक उलट बस्ता बारामदे में और जूते ड्राइंगरूम में) कैसा रहा स्कूल ? पूछेगी उसकी माँ ... तिरछी नज़रों से देखेगी अपनी माँ को फिर झटकेगी अपने पंखों से मरे हुए शब्दों की धूल और मुस्कराएगी .... और फिर चहक उठेगा पूरा घर बस आती होगी गौरैया ।"

12. गौरेया - जयप्रकाश कर्दम

देखते थे बचपन में चहकती फुदकती गौरैया को आकर बैठती थी घर के आँगन में फुदकती फिरती थी यहाँ-वहाँ और कभी फुर्र से उड़कर जा बैठती थी आँगन में खड़े नीम के पेड़ पर चहकाए रखती थी सारा आँगन बनाती थी अपना घोंसला तिनका-तिनका जोड़कर बसाती थी उसमें अपना घर देखते थे हम कौतूहल से कैसे चोंच से चुग्गा खिलाती थी अपने बच्चों को गौरैया बहुत भाता था घर के आँगन में गौरैया का चहकना, फुदकना गौरैया पालती थी अपना परिवार माँ पालती थी गौरैया को अपने परिवार की तरह डालती थी अनाज के दाने हर रोज गौरैया के लिए आँगन में भरकर रखती थी एक बर्तन में उनके पीने के लिए पानी भी चक्की में पीसती थी आटा रख लेती थी बचाकर मुट्ठी भर बाजरे के दाने गौरैया को डालने के लिए एक गहरा आत्मीय लगाव था माँ का गौरैया के साथ देखती थी वह गौरैया में बेटी का अक्स गौरैया की तरह होती हैं बेटियाँ जब तक रहती हैं मां के घर चहकाए रखती हैं सारे घर को चली जाती हैं ससुराल तो सूना हो जाता है माँ का आँगन सालों तक बेटी को नहीं देख पाने वाली माँ गौरैया को देखती तो लगता था खेल रही है उसकी बेटी घर के आँगन में आँगन में चहकती-फुदकती गौरैया थी बेटी के प्रति माँ के संतोष का एक बड़ा संबल लेकिन अब नीम कट गया है आँगन सिमट गया है उसके साथ बहुत कुछ बदल गया है कल तक जो मालकिन थी सारे घर की अधिकार नहीं है आज उस मां का गौरैया को डालने के लिए मुट्ठी भर अनाज के दानों पर भी दाना-पानी नहीं उड़ने-खेलने की जगह नहीं तो कहाँ आए गौरैया बंद सा हो गया है अब उसका आना कभी-कभार आती है, थोड़ी बहुत देर आँगन में घूमकर चहकाकर चली जाती है माँ की बेबस, लाचार आँखें गौरैया को देखती हैं देखती रह जाती हैं| "

13. निर्माण का सुख - राकेशरेणु

"कहीं रह लो इधर - इस कोने में उस रोशनदान पर या आंगन में खड़े नीम पर - यह सारा तुम्हारा घर है कहा मैंने फुदकती तिनके जोड़ती गौरैया से वह क्षण भर रुकी, कुछ सोचा फिर जोर से हंस पड़ी च्यूँ-च्यूँ करती संगीत बिखरती और जवाब दिया - तुम क्या जानो निर्माण का सुख!"

14. गौरैये - जितेंद्र श्रीवास्तव

उलट कर रखना पड़ता है अब आईना अक्सर ताकती थी जो खिड़की के पीछे से अब घोंसला बना लिया है उस गौरैये ने कमरे के भीतर मिलने आती हैं उससे अलग-अलग कद-काठी की और गौरैये जो चहचहाती हैं बिल्कुल उसी स्वर में सीधा छोड़ देने पर खूब चोंच मारती हैं गौरैये आईने में अपनी ही सूरत पर अपने इन डूबी पहचान तलाशतीं गौरैये कमरे में फैला देती है खरपतवार देखकर उजाड़ उनकी चुप्पी में भी ताक लेता हूँ ताख के भीतर उनके घोसले की ओर।"

15. बेज़ार हैं परिन्दे - विनय विश्वास

"ख़ामोश चहचहाना, दो-चार हैं परिन्दे मानो बुरी खबर के आसार हैं परिन्दे! कोई न जान पाया लाशें सड़ीं शहर में सबके लिए मुक़म्मल अख़बार हैं परिन्दे! हो दूर का संदेसा दाने गिने चुने हों मंजूर है करें क्या बेकार हैं परिन्दे! जिन्दे,मरे, पके या कच्चे, पसंद हों जो खाएं हुजूर डटकर तैयार हैं परिन्दे। चुग्गा नहीं गगन में धरती हुई शिकारी कैसे जिएं जहाँ में बेज़ार हैं परिन्दे। पिंजरे बना-बनाकर आकाश को बताया कैसे उड़ें बिचारे बीमार हैं परिन्दे।"

16. गौरैया - असंगघोष

"उड़ती हुई गौरैया चली आती है हमेशा की तरह मेरे जेहन मे चिड़ची करती मन के कोने पर बैठ अपने अक्स पर बार-बार चोंच मारती चिल्ला-चिल्ला कर कहती मुझसे निकल जाओ यहाँ सिर्फ में रहूँगी तुम्हारे जैसे अस्थिर अन्तर्मन की मुझे जरूरत नहीं है।"

17. गौरैया - राकेश मिश्र

"गौरैया बेटियों जैसी आँगन में उतरती है बिखेरने ख़ुशियाँ गौरैया बेटियों जैसी आतीं हैं जबतक अलग ना हो जाएँ घोंसले गौरैया बेटियों जैसी ही फिर आती हैं कभी कभी बदली पहचान के साथ।"

18. ओ री गौरैया - रश्मि शर्मा

"ओ री गौरैया क्‍यों नहीं गाती अब तुम मौसम के गीत क्‍यों नहीं फुदकती मेरे घर-आंगन में क्‍यों नहीं करती शोर झुंड के झुंड बैठ बाजू वाले पीपल की डाल पर ओ री चि‍ड़ी क्‍या तेरे घोंसले पर भी है कि‍सी काले बि‍ल्‍ले की बुरी नज़र कि‍सी के आँगन कि‍सी की छत पर नहीं है तेरे लि‍ए थोड़ी सी भी जगह ओ री चराई पाखी कहॉं गुम गई तेरी चीं-चीं क्‍यों नहीं चुगती अब तू इन हाथों से दाना क्‍यों नहीं गाती भोर में तू अपना गाना ओ री छोटी चि‍ड़ि‍या अब हैं पक्‍के मकान सारे कहां बनाएगी तू घोंसला चोंच में दबाकर कहां ले जाएगी ति‍नका ओ री मेरी गौरैया रूठ न जाना, खो न जाना आओ न मेरे आंगन वाले आइने पर अपनी शक्‍ल देख फि‍र से चोंच लड़ाना मेरे बच्‍चों को भी सि‍खा देना संग-संग चहचहाना।"

19. गौरैया - कौशल किशोर

"गौरैये की चहल उसकी उछल-कूद और फुदकना मालिक-मकान की सुविधाओं में खलल है मालिक-मकान पिंजड़ों में बन्द चिड़ियों की तड़प देखने के शौक़ीन हैं वे नहीं चाहते उनके ख़ूबसूरत कमरों में गौरैयों का जाल बिछे वे नहीं चाहते गौरैया उनकी स्वतंत्र ज़िन्दगी में दखल दे और यह गौरैया है उनकी इच्छाओं के विरुद्ध तिनकों की राजनीति खेलती मालिक-मकान की आँखों में नींद नहीं मलिका परेशान हैं राजकुमार गुलेल संभाल रहे हैं उनके ड्राईंग रुम के शीशों पर गौरैयों का हमला हो रहा है उनके गद्देदार बिस्तरों पर गौरैया बीट फैला रही है वे कोशिश में हैं वे गौरैये को आमूल नष्ट कर देने की कोशिश में हैं और यह गौरैया है उनकी कोशिशों के विरुद्ध घोसले बनाती अण्डे सेती अपने चूजों को चलना सिखाती उछलना सिखाती उछल-उछल उड़ना सिखाती यह गौरैया है ।"

20. साँझ और गौरैया - नीरजा हेमेन्द्र

"मेरे घर के आँगन में अमरूद के वृक्ष़ पर बैठी गौरैया चुपके से उतरती है आँगन में सूख रहे गेहूँ के दानों पर जैसे एक पूरी उम्र उतरती है धीरे... धीरे... धीरे... इच्छाओं के दानों पर गौरैया चुगती है दाने फिर भी पड़े हैं पूरे के पूरे दाने जैसे एक पूरी उम्र गुज़र जाने पर भी पूरी की पूरी उम्र बिखरी रहती है धूसर आँखों में... इच्छाओं सहित साँझ होने तक गौरैया चुग रही दाने धीरे... धीरे... धीरे..."

21. गौरैये - भास्कर चौधुरी

"वे न तो ढोल पीटते हैं न रचते हैं प्रेम पर असंख्य कविताएँ वे तो बस प्रेम करते हैं प्रेम करते रहते हैं।"

22. गौरेया - निवेदिता झा

"झारखंड के खुबसूरत जंगल के बीचों बीच मेरा घर मेरे घर के सामने वह महुआ मेरे पाले तोते, कुत्ते, मोर, बन्दर और चुरा कर आया, वह बाघिन का बच्चा मगर सबसे अलग वह गौरेया। रोज़ विद्यालय से लौटना तेन्दु के पत्ते से बीड़ी बनाना महुआ चुनना फिर माँ की मार चारों भाई बहन की यही दिनचर्या, पिता का तबादला, हमारा फफकना कई रातों हमारा यूँही रोना हम छोड़ आए भूलतीं तो मैं कभी किसी को नहीं फिर उसे कैसे एक सुबह दरवाज़े पर घायल वही कोशिश अपने ज़ेहन पर अरे वही इतनी दूर...कैसे इतनी मोहब्बत इन्सान नहीं कर पाते आज दिल्ली में मेरे पास सबकुछ मगर वह दोस्त नहीं आज फिर रुला गई तुम।"

23. गौरैया-स्वप्निल श्रीवास्तव

(गौरैया को देख कर अक्सर मुझे गौरैया घोष की याद आती है-) उनकी आवाज में चहकती थी गौरैया वह चलती नही फुदकती थी गौरैया के सांवले ओठो की तरह थे उनके ओठ जिसे देख कर कोमल हो जाता था मन परिंदों की तरह वह प्रकट करती थी प्रेम क्लास रूम की अगली सीट पर उन्हें बैठे हुये देख कर लगता था कि वे घोंसले में बैठी हुई हो वे जब अपनी सीट से मुड़ कर मुझे देखती थी तो मेरे भीतर जलतरंग बजने लगता था भीड़ में भी वे अलग दिखती थी अपने हाथ पंख की तरह हिलाती थी कि जैसे वे अभी उड़ान भरने लगेगी एक दिन वे हमारे बीच से उड़ कर चली गयी खाली हो गया हमारा उपवन न जाने किस शाख पर उन्होंने बना होगा घोंसला किस पक्षी को बनाया होगा अपना जीवन साथी यह सोचते हुए मैं बहुत दूर चला जाता हूँ ।

24. ऐ प्यारी गौरैया मेरी! - हर्षित 'हर्ष'

चल तू मेरे साथ वहाँ पर जहाँ बिचारे छोटे पौधे बिन पोषण के सूख रहे हैं सूख रहे उन पौधों को हम पानी देंगे फिर से हरेभरे होकर वे ठंढी शीतल मन्द बयारों से सबके मन को जीतेंगे चल कि हमें उन ठहरे पानी में भी तो छोटे कंकड़ से हलचल भी पैदा करनी है उन्हें उठाकर ,उनके अंदर लहर जगाकर ,उसी लहर से ऊँचे ऊँचे चट्टानों को रोक रहे जो धारा उनकी ,उसे गिराकर ,उनके जल की शीतलता औ तीव्र वेग को जन जन तक फिर पहुंचाना है ऐ छुटकी गौरैया अपने पंख पसारे उड़ चल मेरे साथ गगन में , पंख भले ही हों छोटे पर इन्हें नापना पूरा नभ है , चल कि जहाँ पर खुशियों का दुपहरी सजी हो, प्रेमधार की नदी उमड़कर सबका मन शीतल करती हो और हँसी की शाम छितिज से मीठे मीठे गीत सुनाते नाँच रही हो , चल हम तुम भी उसी नगर में खो जाते हैं , दूर छितिज में मीठी मीठी लोरी सुनकर सो जाते हैं ...

25. चिड़िया रानी चुगलीन पनारे कऽ जूठन - गोलेन्द्र पटेल

साझे-विहाने माई माजेली जऽब बरतन तऽब चुगलीन चिड़िया रानी पनारे गिरल जूठन देखी के दृश्य इसन चुवे लागल अँखियाँ से झर-झर लोर होऽ चुहाड़न-चमारन कऽ करुण कविता सुनीं पत्थर जइसन करेजा कुल्फी मतीन पिघल गइल चीं-चीं चीं-चीं चिड़ियाँ सिसकें, भइल, भोर होऽ रुदन बा हवा में रुदन बा पानी में रुदन बा चूल्हा में रुदन बा दलानी में रुदन बा जवानी में रुदन बा कहानी में रुदन ही रुदन बा चारो ओर होऽ रोजे-रोज़े गौरैया गीत-गजल गावलीं चूल्हानीं मोरे, होखेला स्वादिष्ट शोर होऽ झूमीं-झूमीं नाचेलीं नटखट रानी, चुगीं चावल भींगल पंख, भींगल अँचरा कऽ छोर होऽ... (रचना : 2018) संकलन आभार : नीरज कुमार मिश्र एवं अन्य