एखलाक ग़ाज़ीपुरी
Akhlaque Gazipuri
 Hindi Kavita 

एखलाक ग़ाज़ीपुरी

एखलाक हुसैन खान का जन्म हाजी इकराम हुसैन खान के घर जिला गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) के चर्चित गाँव उसिया में हुआ । इसी गांव में फिल्मी दुनिया के ख्याती प्राप्त चरित्र अभिनेता मरहूम नज़िर हुसैन, जो नेता जी सुभाषचन्द्र बोस के बड़े करीबी रहे हैं, की पैदायश हुई है और उर्दू बिल्टज़ के संपादक हारून रशीद साहब का संबंध रहा है । ऐसे में गंगा-जमुनी तहज़ीब से ताल्लुकात रखने वाले कवि एखलाक हुसैन खान पर कविता एवं रंगमंच का प्रभाव पड़ना लाज़िमी है । आप डीजल रेल इंजन कारखाना से अपने रोजी-रोटी से नाता रखने वाले प्रतिभा के धनी रेलकर्मी कवि ही नहीं बल्कि भारतीय रेल के अंतर्रेलवे नाट्य पुरस्कारों से पुरस्कृत सृजनशील व्यक्तित्व भी हैं । कृतिकार एखलाक हुसैन खान की "अंतर्द्वंद्व" पहली कृति है । आप एखलाक ग़ाज़ीपुरी के नाम से लिखते हैं।


अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी

अन्तर्द्वन्द
भारत भाग्य संवारो तुम
सब मिल कर इनको नमन करो
कब तक लहू लजायेगा
अब राजधर्म का पालन हो
मैं माटी का पुतला मेरा प्यार माटी
टुकड़े टुकड़े पहरों में
जाने क्या क्या छूटेगा
ऑनलाइन अब शोर बहुत है
सबके हों ये काबा काशी
कैसी दुनिया हमारी अजब रंग है
नयी नसल का फितूर है ये
देखो मैं ही प्रथम प्रतिनिधि
गरिमा खण्डित होती है
इन्सान हो तुम सीखो
जयचंद नहीं हूँ
बुरी है रीत दुनियां की
फर्क न होगा अंतिम क्षण में
अब तो ऐसा अक्सर होता है
मानव के अवतार में आ
वहाँ तुम्हारी कलम जगे
भ्रष्ट व्यवस्था के शायद हम सब ही कर्ता धर्ता हैं
क्या अधिकार हमें है बोलो
सेना में भारत बसता है
सेना का अभिमान रहे
सब मील के पत्थर उखड़ गए
दुःशासन के अवतार बहुत
कुछ मोल गंवाने ही होंगे
अब राष्ट्रध्वजा फहराने दो
उनके जीवन का सुख राम के पास हो
बस एक जटायु के जैसा
यहाँ बेईमानी दुष्कर्म नहीं
बस इसको अविरल रहने दो
ये फिर तुमको फुसला लेंगे
खेल तुम्हारा ठीक नहीं
पत्थर का बदला गोली हो
अब गोविंद न आएंगे
तुम्हें लड़ने का अधिकार नहीं
सच्चा धर्म वही होता है
देश हमारा लूट लियो
अब आज का भारत ऐसा है
उनका शोषण होता है
फिर अपना झण्डा गड़ा रहेगा
याद वही रह जाएगा
सुनो राधिका अब कन्हैया नहीं हैं
अपना हिंदुस्तान लिखो
समुचित मोल चुकाया जाए
उससे बढ़कर कौन भला है
अपना कोई मोल नहीं
तेरे इश्क में वफा की ऐसी मिसाल दूँ मैं
हम किसके क्या क्या होते थे
मुझे आदमी का ख़िताब दे
मुझको तुम मजदूर रख लो
तुमसे बेहतर कौन करे है
मैं तेरा दीवाना नहीं रहा
कोई जुर्म नहीं क़ातिल का अब
मैं कैस तुम्हारा हूँ
है शौक बहुत मंहगा हमने जिसे पाला है
यहाँ मुहब्बत में रहजनी है
हमारी उल्फ़त की पाक चादर
तुम मुझसे मिलने आ जाना
तेरे मुकाबिल खड़ा हूँ मैं