Antardah: Rameshwar Nath Mishra 'Anurodh'

अन्तर्दाह (खण्ड काव्य): रामेश्वर नाथ मिश्र 'अनुरोध'



अन्तर्दाह

क्यों आज विकल मन मेरा? क्यों हृदय भरा लगता है ? क्यों जन्म - जन्म का सोया संचित वियोग जगता है ? ।।१।। क्यों प्रकृति मूक बन बैठी? क्यों पवन नहीं चलता है ? क्यों मेरे भोले मन में पावक - प्रदाह पलता है? ।।२।। कोमल कठोर करुणा की कारा में क्यों मन मेरा ? बालक - सा सिसक रहा है है चारों ओर अँधेरा ?।।३।। क्यों आज मेरी आँखों में अविरल आँसू धारा है? क्या नहीं मिलेगा फिर वह जो आँखों का तारा है? ।।४।। जिस प्रतिमा के ऊपर मैं यह जीवन - पुष्प चढ़ाता, जिसके कोमल चरणों पर कविता का फल धर जाता; ।।५।। जो मुख कल अमल कमल - सा सम्मुख रहता था मेरे, जिसके मादक स्मृति - क्षण इस जीवन को हैं घेरे; ।।६।। रोऊँ, तड़पूँ मैं उसको मेरी परवाह नहीं है, लग गयी आग इस तन में जलती - सी निखिल मही है ।।७।। यह सृष्टि जल रही नीचे ऊपर अम्बर जलता है, यह हृदय जल रहा भीतर बाहर यौवन ढलता है ।।८।। भीतर-बाहर ज्वाला है ज्वाला में घूम रहा हूँ, बेसुध उर से मैं उसकी स्मृति को चूम रहा हूँ ।।९।। वह समय रहा स्मृति का, यह समय रहा रोने का ; संसृति की अमिट व्यथा में रो रो जीवन खोने का ।।१०।। हम काट अन्त में लेते जो कुछ पहले बोते हैं, जीवन धुँधली संध्या में हम खोकर फिर रोते हैं ।।११।। क्षण भर का मिलन सृजन में निरवधि वियोग रच जाता; आँसू का घूँट हलाहल बस पीने को बच जाता ।।१२।। षोडस शशि उगता पहने शीतल किरणों की माला, मिलनातुर जलधि उमड़ता जल उठती बाड़व ज्वाला ।।१३।। कोमल किसलय की शैय्या डाली में सुमन सँवारे, मकरन्द भरे सोते हों मुख पर हिम-चादर डारे; ।।१४।। उन मुकुलों के अधरों पर शशि के कर सजल पड़े हों, प्रहरी से सजग चतुर्दिक काँटे सन्नद्ध खड़े हों; ।।१५।। विरही मधुकर की ममता यदि आ कर द्वार टटोले, व्रीड़ा है, तंद्रिल पलकें यदि कोई कुसुम न खोले ; ।।१६।। है किसका दोष बताओ मधुकर का या फूलों का? मादक मरन्द का अथवा मलयानिल की झूलों का? ।।१७।। पल पल का भूला सुख वह सागर - सा हहर रहा है, मानस में बादल बनकर दुख ही दुख घहर रहा है ।।१८।। निर्मम तट से टकरा कर चिल्ला उठतीं ज्यों लहरें, वैसे ही बिलख रहे हैं पहले के अनुभव गहरे ।।१९।। जीवन - नद उमड़ चला है मन - माझी विगत सहारा, तन - नैया पड़ी भँवर में दीखे ना कूल - किनारा ।।२०।। सारी संसृति की करुणा मेरे अंतर में आ कर चुपके से सिसक रही है घन में शशि-सुमुख छिपाकर ।।२१।। खो गयी अहो किस दिशि में मेरी वह प्रेम - कहानी, वेदना - विरह - सागर में मैं डूब रहा मनमानी ।।२२।। अब नहीं प्यार पा सकता कोई इस अंतस्तल से, देखो, बेकार पड़ा है खारे सागर के जल - से ।।२३।। इस मुकुल कली - से मन को कोई ने तोड़ लिया था, कर में लेकर कौतुक में अंतर से जोड़ लिया था ।।२४।। बेसुध सुख के विभ्रम में सोया था जान बसेरा, पर, लूट चला था कोई होते ही मधुर सवेरा ।।२५।। सुख भी कैसा होता है मैंने न अभी तक जाना, बचपन का साथी दुख ही मेरा जाना - पहचाना ।।२६।। सुख - दुख करते रहते हैं नित छूत - छुऔबल खेला, मैं भ्रांत पथिक - सा लखता दुनिया का पागल मेला ।।२७।। जीवन - सागर के तट पर मैं खड़ा विकल बिलखता, हूँ क्षुब्ध, अवांछित, निर्मम काँटों पर आता - जाता ।।२८।। दृग - कंजों से झरती है आँसू - मरंद की धारा, धू धू करके जग जलता जलता है जीवन सारा ।।२९।। यह रुदन और वह स्मिति अम्बर से लगी धरा - सी, सुख-दुख के बीच क्षितिज-सी है ज्वानी अहो जरा - सी ।।३०।। दृग - अंबर से गिरती हैं नित अश्रुमयी जल - बूँदें, जलने दो जलते उर को हम आँख कहो क्यों मूँदें ।।३१।। उर की बढ़ती ज्वाला में घृत सम आँसू पड़ने दो, इस ज्वालामुखी हृदय से दुख - लावा को कढ़ने दो ।।३२।। आयें, सारे दुख-कंटक पथ में बिछ जायें मेरे, वेदना, विरह, प्रत्याशा वरदान मिले हैं तेरे ।।३३।। मैं सहन करुँगा सब कुछ निर्मम! आहें न भरूँगा, देखूँ अब क्या तुम देते साहस से ग्रहण करूँगा ।।३४।। इस जग के सारे दुख को मैं चाह रहा पी जाना, ठुकराये विवश जनों को अपना कहकर अपनाना ।।३५।। छलकर विश्वास किसी का खुश पल भर हो सकते हो, लेकिन प्रवंचना में तुम निरुपम निधि खो सकते हो ।।३६।। तेरी प्रतारणा में है मन - चातक विकल बेचारा, ओ छलिये ! विदग्धता में संचित है हृदय हमारा ।।३७।। वेदना - तिमिर का सागर लहराता अंतस्तल में, आकाश असीम अकंपित डूबा मेरे दृग - जल में ।।३८।। गिन - गिनकर तारे बीती मिलने की प्रखर प्रतीक्षा, उठ - उठ तरंग-सी सोई मेरी अनंत - सी इच्छा ।।३९।। तम-पट में उलझी देखा स्वर्गंगा की धारा को, उसमें डूबते निहारा जीवन के उजियारा को ।।४०।। वे दिन कितने सुन्दर थे हम गिन भी नहीं सके थे, हमको क्या-क्या करना था यह चुन भी नहीं सके थे ।।४१।। मैं हूँ बेसुध, पर सुधि के निशि-दिन बादल मडराते, इस विरह विकल ज्वाला पर रह - रह कर नीर गिराते ।।४२।। वह थी प्रवंचना, माया अथवा उर्वशी अकल थी जिसकी प्रतारणा में यह मेरी चेतना विकल थी ।।४३।। वह रूप कि जिसके सम्मुख संसृति सुषमा शरमाती उसकी अब स्वप्निल स्मृति मन में सजीव - सी आती ।।४४।। शशि मुख पर शशलांच्छन सी काली अलकों की छाया अब नहीं दिखाई पड़ती उस दीपित तन की माया ।।४५।। उन बड़ी और काली सी आँखों की छटा कहाँ है? उन घुघराले बालों की वह काली घटा कहाँ है?।।४६।। नव कनक लता सी उस की सुगठित सुदेह उत्तम थी, कैसे भी योगी मन को वह छलने में सक्षम थी ।।४७।। शुभ चन्द्र सदृश मस्तक पर था बाल अरुण सा टीका जिस के समक्ष जग भर का सौन्दर्य बना था फीका ।।४८।। स्मर धनु सी थी टेढ़ी चल काली भौंह निराली जिसने मेरे मृदु मन पर थी इन्द्रजाल सी डाली ।।४९।। कलिका की पंखुड़ियों सी थीं कोमल-कोमल पलकें थीं चूम-चूम भग जातीं उनको वे कुंचित अलकें ।।५०।। लज्जालु झुकी सी पलकें जैसे जाली मलमल की छबी - डूबी उनआँखों से मानिक मदिरा थी छलकी ।।५१।। भयभीत चकित हिरनी-सी थीं चलित कलित मृदु आँखें, चल चितवन में जादू था या लगी हुई थी पाँखें ।।५२।। शशि - मुख पर लंबित केशों में नयन इस तरह फिरते । मानो सागर - लहरों में दो मीन मौन हो तिरते ।।५३।। हाँ, जो शोभा छायी थी सुमुखी के अहो दृगों में खंजनों और कंजों में वह मिलती कहाँ मृगों में ।।५४।। उन अलसायी आँखों में काजल की रेखा काली लगती सुरसरि में बहती ज्यों कालिन्दजा निराली ।।५५।। उनका नाचना, थिरकना, रूठना, विहँसना, झुकना उन मतवाले अलियों का देखा न कभी भी रुकना ।।५६।। आतप तापित मस्तक पर प्रस्वेद - बिन्दु थे कैसे अगणित हिम-बिन्दु बिछे हों सित कमल पत्र पर जैसे ।।५७।। अकलुष, अनिन्द्य रक्तानन रक्तोत्पल सा निखरा था, उसका सौन्दर्य अनोखा इस जीवन में बिखरा था ।।५८।। नव किसलय सदृश कपोलों पर ब्रीड़ा का पहरा था, शुचि सरल रसेन्दु चमकता अमृत फल-सा चेहरा था ।।५९।। वे गाल गुलाबी रंग के वह भव्य ललाट धवल था, वह रूप सरस मनमोहक मदिरा से भरा नवल था ।।६०।। अरुणाभ कमल पर अलि सी दोनों आँखें मदमाती मैं विकल हुआ करता था जब घूम कभी वे जातीं।। ।।६१।। मुख कमल बीच भ्रमरी-सी घूमा करती रसना थी, वीणा के विकल स्वरों में मादकता की रचना थी ।।६२।। नवजात पत्र से उसके अरुणाभ अधर थे पतले, वर वचन शिशिर कण-से थे पंकज दल पर से फिसले ।।६३।। रक्तिम अधरों पर से थी मुस्कान फिसलती ऐसी चन्द्रा की शुभ चन्द्राभा ज्यों निकल रही हो वैसी ।।६४।। बेसुध अधरों का मधुरस अंजलि भर - भर कमलों की नित पान किया करता था मृदु गुंजन उन विमलों की ।।६५।। उन ओठों के खुलते ही हीरे - से दशन चमकते, उन लाल लाल अधरों में थे दाड़िम सदृश दमकते ।।६६।। अवदात अधर लाली में दाँतों की आभा मिलना जैसे रक्तिम मेघों में लगता चपला का खिलना ।।६७।। क्या थी वह, क्या मैं कहता पतली नासिका मनोहर जग भर की श्री को विधि ने ज्यों रख दी वहाँ धरोहर ।।६८।। या मसृण अरुण पंकज पर सुग्गे की चोंच नुकीली पीती पराग भ्रमरी सी वह थी नासिका रसीली ।।६९।। नासिका नोक पर बैठी कोमल कपोल की लाली मादकता भरे नयन में हँसती काजल की काली ।।७०।। परिमल - पूरित मलयज-सी आतीं नि:श्वास हिलोरें, मन - हृदय बेध देती थीं पक्ष्मल - कटाक्ष की कोरें ।७१ ।। रोमिल शिरीष - वैभव सम थे कान अनोखे चोखे अथवा रसाल की फाँकें रक्खी थीं मधु में धो के ।।७२।। बाहें कुसुमित राहों - सी चाहों की नन्दन वन - सी पुतली-सी अतिशय कोमल मंजुल जीवन के धन - सी ।।७३।। नव कमल नाल-सी मंजुल अतुलित सौन्दर्यमयी थीं उनकी ईषत् मुस्काहट मेरे हित नयी-नयी थी ।।७४।। थे खिले इन्द्रधनु नभ के मानो दो, दो कोने में अथवा दो दल सरसिज के हों लटक गये सोने में ।।७५।। सरसिज पल्लव - सी चंचल कोमल कर में अंगुलियाँ ज्यों नचा रहा हो मारुत अधखिली कुसुम की कलियाँ ।।७६।। उस कनक लता काया में थे पीन पयोधर फल - से हाँ, उन्हें देखकर होते थे मेरे प्राण विकल - से ।।७७।। दो सजे पयोधर घट - से मद भरे, कठिन थे उभरे कोई न सम्हल पाता था ऐसे थे उनके नखरे ।।७८।। सर सरिस उदर में उसके थी भँवर संकुचित त्रिवली जिसकी हलकी झलकी से उर पर गिरती थी बिजली ।।७९।। वह कलभ शुण्ड क्या तुलती जाँघों में मृदुल सरलता देखा नितम्ब पर रखते कर-किसलय आप फिसलता ।।८०।। मंगल मरन्द की मृदुता मल दी नितम्ब में कितनी फिसलन चिकनाहट रहती कदली- स्तम्भ में जितनी।।८१।। अश्रुत अदृष्ट अनलंकृत कल्पनातीत वह छवि थी साकार सिद्धि थी अथवा सौन्दर्य यज्ञ के हवि की ।।८२।। अम्बर में इन्द्रधनुष - सी घन सघन बीच चपला-सी वह मूर्ति बसी नयनों में रजनी में चन्द्रकला - सी ।।८३।। सौन्दर्य पराजित होकर था दूर लजाता खुद से वह रूप देख होते थे मेरे दृग-मृग बेसुध- से ।।८४।। वह थी मधुमयी कहानी वह कैसा था मधुमय स्वन! मैं था वह मधुरस पीता उस माधुरि में मधुमय बन ।।८५।। उसका मादक था जीवन उसका मादक था यौवन उसकी असीम मृदुता में डूबा था मेरा तन -मन ।।८६।। सुन्दरता के सागर में नहलाई - सी काया थी चन्द्रमा और चपला से बढ़कर उज्ज्वल छाया थी ।।८७।। मैं था कठोर पाहन सा वह प्रेम- पीयूष की धारा बनकर थी बही हृदय से भींगा था जीवन सारा ।।८८।। मलयानिल - सी थी शीतल कोमल थी छुई-मुई - सी दुख-तम में चान्द्रमसी-सी परिचय में दिवस कुई-सी ।।८९।। चिर आकांक्षा - सी जागी क्षण तृप्ति सदृश थी सोई कुसमय के उस परिचय में अभिशाप छिपा था कोई ।।९०।। स्वप्नाभा में आयी वह जगने में रूठ चली थी मैं व्याकुल सोच रहा था वह कोमल कली भली थी ।।९१।। उस कटिक्षीणा की चितवन इषत् इषु - सी इस उर में चुभ गयी न जाने कब से मेरे संयोग मधुर में ।।९२।। ऊषा की अरुणाई में उसकी मुस्कान निहारा संध्या के पीलेपन में देखा था लाल अँगारा।।९३।। इस व्यथित व्योम में जुड़ते वेदना - जलद के टुकड़े क्या पुनः नहीं मिल सकते चकई के जोड़े बिछुड़े ? ।।९४।। यह अचल हृदय कँपता है स्मृति - समीर को पा कर मन सिहर -सिहर उठता है उसको मस्तक में ला कर ।।९५।। सौरभ निकुञ्ज पाली में रजनी चन्द्रिका बिछाये स्वागत करती थी मेरा मणियों के दीप सजाये ।।९६।। रजनी की तम - सरिता में था चाँद विहँसता तिरता मधुकण का भार सँजोए मादक मारुत था फिरता ।।९७।। रजनी के वक्षस्थल पर सोता शशि, सीकर ढुलता। नट - खट समीर से चंचल अंचल पल-पल में खुलता।। ।।९८।। झिलमिल मलयानिल चलकर सुमनों की सेज सजाता स्वप्निल अलसित आँखों से झट-पट न वस्त्र हट पाता ।।९९।। अब चाँद अग्नि बरसाता अम्बर झरता ज्वाला-कण लू लिए पवन है आता जलता रे जीवन क्षण-क्षण ।।१००।। ये कुंज, विटप, सर, सरिता रजनी औ' वायु सुरीली स्थिर वियोग में लगती मेरी सुख टुकड़ी गीली ।।१०१।। कितने दिन सुख-संगम के डूबे विस्मृति के जल में जग कब तक चल सकता है केवल आशा के बल में ।।१०२।। निष्ठुर है करुण कहानी इन क्षण जीवी सुमनों की बचती बस परिमल गाथा मधुरिल मकरन्द धनों की ।।१०३।। बीहड़ जीवन जंगल में जलती है भीषण ज्वाला पर, किधर भटकती मेरी पीयूष भरी घन - माला ।।१०४।। छिप गयी कहाँ मन मोहक मुरली की वह स्वर लहरी इस में अब गरज रही है वेदना हृदय की गहरी ।।१०५।। निर्मल मकरन्द गिराकर दृगकंज हो चुके खाली फिर आकर कौन भरेगा पलकों की रीती प्याली ।।१०६।। इन खोई - सी आँखों में खोया- खोया सपना है इस मानव भरे विजन में कोई भी नहीं अपना है ।।१०७।। है नींद नहीं आँखों में रोते - रोते दृग सूखे ये नेत्र सुदर्शन के ही हैं व्याकुल, प्यासे, भूखे ।।१०८।। जागते, बदलते करवट रजनी भी बीत चली रे मेरे इस मृदुल सुमन पर क्यों छोड़ गई बिजली रे ।।१०९।। दुख-दग्ध, प्रपीड़ित उर में लेती चिन्तग्नि हिलोरें निर्मम - सी जला रही है जीवन को खूब झकोरे ।।११०।। उड़ती ज्यों नील गगन में जलयुक्त तमस की ढेरी वैसे इस व्यथित हृदय से उड़ती प्रत्याशा तेरी ।।१११।। व्याकुल लहरों को थपकी दे - दे जब पुलिन सुलाता तब हृदय व्यथा चुपके से कोई कुरेदने आता ।।११२।। जब मैं सोता रहता हूँ सुख - सपनों के आंगन में तब कौन हृदय में आ कर हलचल भर देता मन में ।।११३।। मेरे मानस की करुणा रोती उर के कोने में क्या कहूँ कि क्या सुख मिलता भीतर - भीतर रोने में ।।११४।। युग बीत गया है कितना हम क्या जानें अनजाने ? इस स्वप्नमयी संसृति में किसको हम अपना मानें? ।।११५।। यह सृष्टि स्वार्थ की प्यारी स्वार्थी हैं अम्बर - तारे वे लुप्त अतीन्द्रिय अनुभव हैं बने स्वार्थमय सारे ।।११६।। जी भरकर रे, मन हँस ले है विकट परीक्षा बाकी प्रतिमा प्रतिनिधि बन बैठी लेकिन अंतर्हित झाँकी ।।११७।। रे, देख पूर्व में आता वह अरुण प्रभात सुहाना खग-कुल के कुल-कुल सुर में स्मृतियाँ गातीं गाना ।।११८।। वह संधि और यह बिछुड़न स्मिति वह और रुदन यह वह मधुर प्रभात, बिलखता सावन का नील गगन यह ।।११९।। तेरे समान जो कुछ थी वह वस्तु विश्व से प्यारी! तेरे विछोह के कारण उठ गयी सृष्टि से सारी ।।१२०।। क्यों प्राण - पखेरू अब तक उर - पिंजर में सोया है ? यह निकल नहीं क्यों जाता किस माया में खोया है ? ।।१२१।। इस वितत विश्व - दर्पण में देखा वह रूप सलोना देखा जगती में करते उसका वह जादू- टोना।।१२२।। देखा था अरुण प्रभा में उसके चरणों की लाली देखा था निविड़ निशा में कुंचित केशों की काली ।।१२३।।। देखा था उसको नभ निभ हिम-बिन्दु प्रेम बरसाते पाया था कुमुद विपिन में उसको चंद्रिका लुटाते ।।१२४।। उसकी कोमल करुणा को देखा चहुँदिशि बिखरी - सी निष्कलुष हृदय की ममता शशि किरणों में निखरी - सी ।।१२५।। देखा निशिकर - वाहन पर बैठे नभ में फिरते भी देखा इस दुखित धरा पर हिमकण - मोती धरते भी ।।१२६।। जब तान मिलाता निर्झर कुड्मल-किसलय के स्वर में धीरे से गीत उठे तब मेरे आकुल अंतर में ।।१२७।। पथ पुण्य - प्रसून बिछे थे उसके औचक हँसने से कुम्भों से अर्घ्य ढुला था दृग -कोरों के फँसने से ।।१२८।। वह भ्रम, विभ्रम या सच था या मनस नष्ट था मेरा किस नीड़ में जाकर कोकिल तू ने ले लिया बसेरा ? ।।१२९।। उस में मैंने देखा था अनुराग-सिन्धु लहराते पर, वासंती सुषमा में स-विराग गीत को गाते ।।१३०।। उसकी कठोरता, मृदुता वक्रता, सरलता, ऐंठन मन-हृदय मथा करती थी उसकी वह तिर्यक चितवन ।।१३१।। उसका कहकहा लगाना मेरा सकुचाकर हँसना अधरों का चुम्बन लेना फिर उन बाहों में कसना ।।१३२।। उन नेत्रों के कोनों में मन का क्षण मात्र अटकना देखा चंचल नयनों का विद्युत की तरह झटकना ।।१३३।। हो रुष्ट कदाचित् क्षण भर उन भौहों का चढ़ जाना औ' गर्म सहज साँसों का त्वरता से जाना-आना ।।१३४।। उनकी वेदना-अनल में जलता है प्राण-पतिंगा दुख के इतने रंगों में यों जाने किसने रंगा ? ।।१३५।। क्या शमी लता - सी उस में भीषण दावाग्नि छिपी थी ? बाहर शीतल हरियाली मृग-तृष्णा सदृश दिखी थी ।।१३६।। वह प्रीती नहीं तो क्या थी? धोखा, प्रपंच, माया थी ? वाड़व ज्वाला भीतर थी बाहर जल की छाया थी ? ।।१३७।। है सच्चा प्रेम निशा का हिमकर का औ' तारों का चातक, चकोर का पावन स्वाती का, अंगारों का ।।१३८।। ओ मलयानिल! मत छूना मेरे इस जलते तन को शायद तुम भी जल जाओ झट छोड़ भगो उपवन को ।।१३९।। पर, कौन रोक सकता है मधु पर मरने वालों को ? दीपक की तिग्भप्रभा में देखा जलने वालों को ।।१४०।। रोका किसने प्रेमी को जलते वियोग-ज्वाला में ? खोते किसने रोका है शशि को पयोदमाला में ? ।।१४१।। लो, तुम भी जलो इसी में मैं तो जल रहा अकेला आओं, हम चलें विपिन में जग का तज निखिल झमेला ।।१४२।। जा, जा हट जा ओ पगली! क्यों मुझे सताने आयी? मेरी बुझती ज्वाला को तू और जलाने आयी ! ।।१४३।। अच्छा, अच्छा आ सुन ले मूर्खे! न रूठ तू मुझ से निस्सीम शांति सुखदायिनि संदेश भेजता तुझ से -- ।।१४४।। "बस्ती थी बसी उजाड़ा निर्दयी ! बढ़ी है पीड़ा बनकर वेदना अपरिमित फैली अतीत की क्रीड़ा ।।१४५।। ईषत् चालित नयनों का इंगितमय वह स्पंदन उर - पुर में जगा रहा है करुणा का भारी क्रंदन ।।१४६।। चंचले! चपल चपला -सी चमको इस नीलाम्बर में चिर सघन पयोद हटाकर आ जा जीवन - संगर में ।।१४७।। शरदेन्दु सान्द्र - सी चमको मेरी दरिद्र धरणी पर कलरव से अब गा दो ना अपनी प्रतीप करणी पर ।।१४८।। शतदल के विकच वनों में निर्झर के सुखद स्वरों में खोजूँगा चिह्न तुम्हारा तारों के नील घरों में ।।१४९।। भ्रमरी की मृदु गूँजों में फूलों की मृदु लाली में खोजूँगा चिह्न तुम्हारा फसलों की हरियाली में ।।१५०।। आ तुझे लगा लूँ उर से आलिंगन हो इस वन में फिर सुधा-वृष्टि कर मन में मस्ती भर दे इस तन में ।।१५१।। चाहे जितनी मादकता लेनी हो, ले इस जन से क्यों हाय, अकिंचन कहकर तू बिछुड़ चली जीवन से ।।१५२।।" जा जल्दी चली ओ पावनि ! मेरा संदेश सुनाने मेरी बुझती ज्वाला को आ जाना पुनः जगाने ।।१५३।। मैं तेरी प्रत्याशा में बैठा - बैठा रोऊँगा हाँ, आना, देर न करना भूलना न मैं सोऊँगा ।।१५४।। वृन्तों में फूल खिले हैं सलिलों में कमल थिरकते इस चंद्रमुखी रजनी के घन - घूँघट आज सरकते ।।१५५।। क्यों खिझा रही है मुझको चंचल तरंग - सी जूही ? जगती के अणु, कण-कण में दिखती विभु - सी बस तू ही ।।१५६।। चंचले तरंगिणि गंगे ! कलकल निनाद को रोको उर की विरहाग्नि प्रखर में अब ईंधन और न झोको ।।१५७।। झरझर आँसू झरते हैं कृश तन कँपता थरथर है व्याकुल वेदना बिलखती ठोकर खाती दर - दर है ।।१५८।। आया वसंत मैं क्या दूँ यह तन-धरती है खाली स्मिति - मदिरा से भर दो मेरे ओठों की प्याली ।।१५९।। सुनयन, नासा, मुख, अलकों के सदृश वस्तु जब आती चंचल चपला - सी स्मृति तब दौड़ हृदय में जाती ।।१६०।। ये सुक, कपोत, मृग, मधुकर, खंजन, कोकिला विचरते दर, कुंदकली, शशि, दाड़िम, स्मर - शर, हंस हहरते ।।१६१।। जलदेव - पाश, श्रीफल औ' इस कनक कदलि का कम्पन उर व्यथित प्रथित करते हैं इनके असह्य स्पन्दन ।।१६२।। यह शांति दायिनी संध्या यह स्वर्णिम दिवस दमकता नव आम्रमंजरी मंजुल कर में ले मदन महकता ।।१६३।। होता परिरंभ क्षितिज में आकाश - धरा का अनुपम नभ के सूने आंगन में राका-शशि का सुख-संगम ।।१६४।। नदियों का मिलन जर्लाध से ऊषा का मिलन अरुण से अब बीती राग सुनाते उठते हैं गीत करुण से ।।१६५।। क्यों अमानिशा छाई है इस चक्रवाक के सुख में ? है संगी कौन यहाँ पर जो साथ मेरा दे दुख में ?।।१६६।। सुख सुख के हैं सब साथी दुख में न कोई संग देता है साथी वही जगत में जो दोनों में रंग लेता ।।१६७।। निर्वाण करूँ क्या लेकर लौटेगी बाजी हारी उस शून्य हृदय-मंदिर का, मैं केवल प्रेम - पुजारी ।।१६८।। यह हृदय लबालब मेरा तुम यों न बनो अनजानी ! पैरों की ललित गुलाली देखूँ, हे मन की रानी ! ।।१६९।। क्यों शमित हो गयी पाकर आँसू को शीतल ज्वाले बुझकर भी छोड़ गई हो उर में बुल्ले - से छाले ।।१७०।। जल भरे बड़े छालों पर आओ संतोष मुझे है फूटेंगे, चीख बढ़ेगी पर, इसका दोष तुझे है ।।१७१।। अन्तस्तल के छालों का अब पीव अश्रु बन गिरता निःश्वास पवन के कारण इन आँखों में घन घिरता ।।१७२।। ओ नील गगन !अब तुम भी मेघों में चाँद छिपाकर रोओ मेरे हे संगी ! वर्षा मिस अश्रु गिराकर ।।१७३।। वह हँसी और मधु-मदिरा इन अधरों पर आने दो जीवन की शरद समा पर फिर से बसंत छाने दो ।।१७४।। सुख-स्वाति-बूँद-सी बरसो मेरे सूखे जीवन में जग-प्रेम बने मुक्तामणि मेरे सीपी - से मन में ।।१७५।। मेरे गीले गालों पर फूटे पल्लव की लाली जीवन-पथ चमक रहा हो दुबकी हो रजनी काली ।।१७६।। जीवन सरिता बहती है दुख-सुख जिस के दो तट हैं वेदना लहरियाँ जिस की आवर्त्त विरह - झंझट हैं ।।१७७।। दुख ही है सत्य जगत में सुख है केवल कुछ दिन का सुख-दुख के चक्र निरन्तर चलते, स्थिर सुख किनका ? ।।१७८।। इस क्षणभंगुर जीवन में दुख ही है सत्य चिरंतन ओ मेरे उर के वैभव तेरा शत-शत अभिनंदन ।।१७९।। दुर्दांत विरह का कटु फल लटका है क्षणिक भुवन में आनंद कहाँ मिल सकता इस छोटे से जीवन में ? ।।१८०।। इस नश्वरता में बोलो है कौन अमर संसृति में ? पर, किसके गीत विहँसते मेरे उर की झंकति में ? ।।१८१।। सुख-दुख के महा निलय में है प्रगट प्रभा पर, खोई वह ज्योति प्राप्त हो मुझको यह अर्घ्य दान ले कोई ।।१८२।। नश्वरता में अविनश्वर है एक तत्त्व अलबेला जिसके संग मैंने कुछ दिन खेला था निपट अकेला ।।१८३।। ओ देवि ! उदित हो जाओ मेरे इस हृदय - गगन में साधना अहो है दुष्कर पर, मानस मिलन-लगन में ।।१८४।। वेदना-निशा पर प्यारी! आनन्द-भरी ऊषा-सी फैलो मेरे जीवन में चिर वैभव-अभिलाषा-सी ।।१८५।। दुनिया में सब कहते हैं पौरुष है भाग्य नियन्ता वह चीर अनागत-पट को सुख लाता, भगती चिन्ता ।।१८६।। ओ मेरे पौरुष ! जागो उर-अन्तर की ज्वाला में दुर्वह अभिशाप छिपा दो सुख-शीतल घन-माला में ।।१८७।। मेरे जीवन - उपवन में व्याकुल है पपिहा प्यासा बरसो, फिर तृषा बुझे यह वह मिलने की प्रत्याशा ।।१८८।। इस उजड़े - से उपवन में हो फिर अलि-कुल का गुंजन फिर से बस्ती बस जाये गृह - आंगन नूपुर - शिंजन ।।१८९ ।। लकदक-लकदक करता हो मेरा यह जीवन धुँधला अब व्यथित हृदय में फैले वह परम ज्योति अति विमला ।।१९०।। संसार - वृक्ष - डाली में वह पुण्य - पुष्प लटका हो जिसकी प्रमोद - माला में यह तन-मन-स्वन भटका हो ।।१९१।। प्रिय पुण्य - पूत पंकज से आनन्द - राग झरता हो मधुपान विश्व कर नाचे कोई न कभी मरता हो ।।१९२।। करुणा के शीतल घन में मुस्काती ममता मेरी बिछुड़ों को पुनः मिलाये घर-घर में देकर फेरी ।।१९३।। दुख-मग्न, भग्न हृदयों के तारों की स्वर लहरी हो अग-जग के सदनांगन में मेरी ममता छहरी हो ।।१९४।। जीवन - असीम अम्बर में वह मधुरालोक खिला हो सुख-दुख के दिव्य मिलन से मानव का शोक जला हो ।।१९५।।

 
 
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